श्रीमंदिर जी - सनातन ज्ञान

श्री मंदिर जी

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द्वारका का वह श्रापित रत्न जिसने स्वयं भगवान को भी नहीं बख्शा

A divine and artistic depiction of Shri Krishna and Mahabali Jamwant engaged in a legendary encounter during the Dvapara Yuga.
Shri Krishna aur Jamwant

संपादकीय

राम-राम साथियों, मैं आदित्य पोरवाल आज एक बार फिर आपके समक्ष एक ऐसी अनसुनी और विस्मयकारी गाथा लेकर उपस्थित हूँ जो आपको गहरे चिंतन पर विवश कर देगी। आज जब मैं प्राचीन ग्रन्थों के पन्ने पलट रहा था, तो मेरी नज़र द्वापर युग के एक ऐसे काले अध्याय पर पड़ी जिसे अक्सर लोग सामान्य समझकर भूल जाते हैं। यह कथा हमें यह कठोर और सत्य सबक देती है कि जब भौतिक लालच और मिथ्या कलंक का विष फैलता है, तो स्वयं ब्रह्मांड के रचयिता को भी उस अग्नि-परीक्षा से गुजरना पड़ता है। तो आइए सज्जनों, बिना किसी विलंब के आज के इस घने और रहस्यमयी वृत्तांत की गहराइयों में उतरते हैं।


अंधेरी रात और द्वारका में फैला हाहाकार

द्वापर युग में समुद्र के किनारे बसी स्वर्ण नगरी द्वारका उस रात एक अजीब सी खामोशी और भय की चादर में लिपटी हुई थी। आमतौर पर जहाँ रातों में भी उत्सव और आनंद का वातावरण रहता था, वहाँ आज एक मनहूस सन्नाटा पसरा था। यह सन्नाटा किसी बाहरी आक्रमण का नहीं, बल्कि एक ऐसे गहरे रहस्य का था जिसने पूरी नगरी की शांति को निगल लिया था। राजा सत्राजित का भाई प्रसेनजित कल सुबह शिकार के लिए घने जंगलों की ओर गया था, लेकिन वह लौटकर नहीं आया। चिंता का विषय केवल प्रसेनजित का गायब होना नहीं था, बल्कि वह बहुमूल्य वस्तु थी जो वह अपने साथ ले गया था। उसके गले में सूर्यदेव द्वारा प्रदान की गई वह दिव्य 'स्यमंतक मणि' थी, जिसकी चमक से रात भी दिन में बदल जाती थी और जो प्रतिदिन अष्टभार स्वर्ण उत्पन्न करती थी। जब प्रसेनजित का अश्व बुरी तरह क्षत-विक्षत अवस्था में वन के बाहरी छोर पर मिला, तो द्वारका के नागरिकों के चेहरों पर खौफ की लकीरें खिंच गईं। एक ऐसी अदृश्य और भयानक घटना घट चुकी थी जिसका अनुमान लगाना भी किसी साधारण मनुष्य के वश में नहीं था।

कलंक का वह काला दाग

अगले दिन सूर्योदय के साथ ही द्वारका में एक ऐसी अफवाह ने जन्म लिया जिसने सीधे भगवान के चरित्र पर ही उंगली उठा दी। सत्राजित का लालच और अहंकार इतना प्रबल था कि उसने भरे दरबार में यह उद्घोषणा कर दी कि उसके भाई की हत्या और मणि की चोरी किसी और ने नहीं, बल्कि स्वयं श्रीकृष्ण ने की है। यह आरोप इतना भयंकर और अप्रत्याशित था कि पूरी सभा स्तब्ध रह गई। असल में, यह उस श्राप का प्रभाव था जो भाद्रपद शुक्ल चतुर्थी के चंद्रमा को देखने के कारण श्रीकृष्ण पर लगा था। यह एक ऐसा दिव्य विधान है कि उस दिन चंद्र दर्शन करने वाले पर झूठा कलंक अवश्य लगता है। श्रीकृष्ण का दिव्य और शांत मुखमंडल इस गंभीर आरोप के बाद भी विचलित नहीं हुआ। वे जानते थे कि यदि इस रहस्य पर से पर्दा नहीं उठाया गया, तो आने वाले युगों तक यह कलंक उनके नाम के साथ जुड़ा रहेगा। अपने सम्मान और सत्य की रक्षा के लिए, उन्होंने अकेले ही उस खूंखार और मृत्यु से भरे जंगल में जाने का निश्चय किया।

घने वन का वह भयानक सुराग

द्वारका की सीमाओं को पार कर जब श्रीकृष्ण उस प्राचीन और घने वन में प्रविष्ट हुए, तो वहां का वातावरण अत्यधिक डरावना था। ऊंचे-ऊंचे वृक्षों ने सूर्य की किरणों को जमीन तक पहुँचने से रोक रखा था। चारों ओर जंगली पशुओं की भयानक आवाजें गूंज रही थीं। कुछ दूर आगे बढ़ने पर उन्हें प्रसेनजित का मृत शरीर मिला। उसके शरीर पर किसी हथियार के नहीं, बल्कि एक विशालकाय सिंह के पंजों के निशान थे। श्रीकृष्ण ने सिंह के पंजों के निशानों का पीछा करना शुरू किया। कुछ और गहरे जंगल में जाने के बाद, उन्हें वह सिंह भी मृत अवस्था में मिला। उस शक्तिशाली सिंह को किसी ऐसे जीव ने मारा था जो उससे भी कई गुना अधिक बलवान और क्रूर था। वहां मौजूद पैरों के निशान किसी साधारण जानवर के नहीं, बल्कि एक अत्यंत विशालकाय और भयंकर भालू के थे। यह सुराग इतना चौंकाने वाला था कि यह स्पष्ट हो गया कि स्यमंतक मणि अब किसी साधारण चोर के हाथ में नहीं, बल्कि किसी अत्यंत शक्तिशाली और प्राचीन प्राणी के पास है।

अथाह गुफा और वह रहस्यमयी प्रकाश

विशालकाय भालू के पैरों के निशानों का पीछा करते हुए श्रीकृष्ण एक ऐसे पहाड़ के पास पहुंचे, जहाँ एक अथाह और काली गुफा का प्रवेश द्वार था। वह गुफा इतनी गहरी और घुमावदार थी कि उसके भीतर झांकने मात्र से ही मन में भय उत्पन्न हो जाए। बाहर खड़े उनके सैनिक उस अंधकार को देखकर कांपने लगे, लेकिन श्रीकृष्ण ने उन्हें वहीं रुकने का आदेश दिया और अकेले ही उस पाताल जैसी गुफा में प्रवेश कर गए। जैसे-जैसे वे गुफा की गहराइयों में जा रहे थे, घोर अंधकार एक अजीब से सुनहरे प्रकाश में बदलने लगा। यह प्रकाश उसी स्यमंतक मणि का था। गुफा के सबसे भीतरी कक्ष में पहुँचकर उन्होंने देखा कि एक अत्यंत विशालकाय और भयानक भालू गहरी निद्रा में है, और उसी कक्ष में एक धाय मां एक छोटे से बालक को झूला झुला रही है। वह बालक उसी दिव्य मणि से खेल रहा था। उस स्थान का वातावरण किसी मायावी दुनिया से कम नहीं लग रहा था।

महाबली का वह प्रलयंकारी क्रोध

श्रीकृष्ण ने बिना किसी शोर के उस मणि को उठाना चाहा, लेकिन एक अजनबी को वहां देखकर वह बालक जोर-जोर से रोने लगा। बालक के रोने की आवाज सुनकर वह विशालकाय भालू अपनी निद्रा से जाग उठा। वह कोई साधारण जंगली जीव नहीं था, बल्कि रामायण काल के अजर-अमर और महाबली ऋक्षराज जाम्बवन्त थे। युगों के परिवर्तन के कारण जाम्बवन्त अपने आराध्य को पहचान नहीं पाए। उन्हें लगा कि कोई साधारण मनुष्य उनकी गुफा में घुसकर उनके खजाने को चुराने का प्रयास कर रहा है। उनका क्रोध इतना भयंकर था कि उनकी एक दहाड़ से ही उस विशाल गुफा की चट्टानें दरकने लगीं। उन्होंने श्रीकृष्ण को ललकारा और उन पर एक ऐसा प्रहार किया जिसे सहना किसी भी आम इंसान के लिए असंभव था। दोनों के बीच एक ऐसा भयानक मल्ल-युद्ध छिड़ गया जिसने गुफा के भीतर प्रलय जैसी स्थिति उत्पन्न कर दी।

अठाईस दिनों का वह भयंकर संग्राम

यह कोई साधारण युद्ध नहीं था। जाम्बवन्त के पास युगों का संचित बल था और दूसरी ओर स्वयं नारायण के अवतार थे। यह भयंकर संग्राम बिना रुके, बिना थके पूरे अठाईस दिनों और रातों तक चलता रहा। गुफा के भीतर चट्टानें टूट-टूट कर गिर रही थीं, और उनके टकराने की गर्जना से पूरा पर्वत कांप रहा था। बाहर खड़े द्वारका के सैनिक इतने दिनों तक प्रतीक्षा करने के बाद निराश होकर लौट गए थे, क्योंकि उन्हें लगा कि उस खौफनाक गुफा में कोई भी जीवित नहीं बच सकता। लेकिन भीतर का दृश्य कुछ और ही था। छब्बीसवें दिन के बाद, महाबली जाम्बवन्त के शरीर की नसें ढीली पड़ने लगीं। उनका वह असीमित बल, जिस पर उन्हें इतना गर्व था, अब जवाब दे रहा था। उनके मन में यह कौतूहल उत्पन्न होने लगा कि इस पूरे ब्रह्मांड में ऐसा कौन सा योद्धा है जो उनके प्रहारों को इतनी आसानी से झेल सकता है और उन्हें परास्त कर सकता है।

श्राप की मुक्ति और परम समर्पण

अठाईसवें दिन जब जाम्बवन्त पूरी तरह से पस्त हो गए और उनका शरीर पसीने से लथपथ हो गया, तब उनके मन में ज्ञान का प्रकाश उत्पन्न हुआ। उन्होंने ध्यान लगाकर देखा तो उन्हें उस युवा योद्धा में अपने परम आराध्य भगवान श्रीराम की छवि दिखाई दी। यह दृश्य देखते ही उनकी आँखों से अश्रु बह निकले। महाबली जाम्बवन्त ने तुरंत श्रीकृष्ण के चरणों में गिरकर क्षमा याचना की। भगवान ने मुस्कुराकर उन्हें गले लगा लिया और स्यमंतक मणि का पूरा वृत्तांत सुनाया। अपने आराध्य को प्रसन्न करने के लिए जाम्बवन्त ने न केवल वह दिव्य मणि उन्हें सहर्ष सौंप दी, बल्कि अपनी पुत्री जाम्बवती का विवाह भी श्रीकृष्ण के साथ कर दिया। जब श्रीकृष्ण मणि और जाम्बवती के साथ सकुशल द्वारका लौटे, तो पूरी नगरी में हर्ष की लहर दौड़ गई। सत्राजित को अपने कृत्य पर घोर पश्चाताप हुआ और श्रीकृष्ण पर लगा वह झूठा कलंक हमेशा के लिए मिट गया। यह कथा हमें स्मरण कराती है कि सत्य चाहे कितनी भी गहरी गुफा में क्यों न छिपा हो, वह एक न एक दिन अपना प्रकाश अवश्य फैलाता है।

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— श्री आदित्य पोरवाल, संपादक

"मैं इस साइट के माध्यम से सनातन ज्ञान की अनमोल कहानियों, विधि सामग्री, राशिफल और पंचांग को आप तक पहुँचाने का प्रयास कर रहा हूँ। मैं यह चाहता हूँ कि आप उन सभी को हमारी कहानियां शेयर करें जो जीवन की दौड़ में अपनी जड़ों से दूर हो गए हों, या जिन्hें चिंता है कि हमारे बच्चे अपनी संस्कृति कैसे सीखेंगे। मेरा उद्देश्य है कि इन कहानियों के माध्यम से धीरे-धीरे समस्त दुनिया में हमारे सनातनी अपनी जड़ों से जुड़ सकें।"