श्री मंदिर जी

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Shri Hanuman Mandir par aaj: Three New Stories published today;

पाताल में धधकता सूर्य: स्यमंतक मणि का वो भयंकर सत्य जो आज भी विंध्य में कैद है

 

अध्याय १: अंधकार में धधकता हुआ रक्तवर्णी प्रकाश

विंध्याचल की उन अगम्य और अभेद्य पर्वत श्रृंखलाओं में आज भी एक ऐसी रहस्यमयी कंदरा विद्यमान है, जिसके भीतर जाने का मार्ग कोई नहीं जानता। अमावस्या की उस भयंकर रात्रि में, जब सारा संसार गहन निद्रा में लीन था और वन के हिंसक पशु भी अपनी गुफाओं में दुबके हुए थे, युवा साधक आदित्य उस दुर्गम मार्ग पर आगे बढ़ रहा था। उसके भीतर एक ऐसी आध्यात्मिक ज्वाला थी जो उसे रुकने नहीं दे रही थी। हवाएं किसी क्रुद्ध प्रेत की भांति चीत्कार कर रही थीं। अचानक, उस भीमकाय गुफा के मुख से एक विचित्र सी ऊष्मा बाहर आने लगी। यह किसी साधारण अग्नि की ऊष्मा नहीं थी, बल्कि ऐसा प्रतीत हो रहा था मानो साक्षात् सूर्य अपने प्रचंड ताप के साथ पाताल में उतर आया हो। आदित्य ने जैसे ही गुफा के भीतर अपना पहला कदम रखा, दीवारों पर अंकित प्राचीन पाषाण चित्र एक रक्तिम आभा से चमक उठे। वातावरण में एक ऐसा भारीपन था कि श्वास लेना भी पीड़ादायक हो रहा था। गुफा की गहराइयों से एक ऐसी प्रतिध्वनि आ रही थी, जैसे कोई अति-विशालकाय हृदय धड़क रहा हो। हर धड़कन के साथ वह लाल प्रकाश और अधिक तीव्र हो जाता था। वह प्रकाश इतना सम्मोहक और तीव्र था कि वह सीधे मस्तिष्क की नसों पर प्रहार कर रहा था, मनुष्य के भीतर छिपे सबसे गहरे लोभ को जगाने का प्रयास कर रहा था।

अध्याय २: महाबली की निद्रा और वो प्राणघातक गुरुत्वाकर्षण

ज्यों-ज्यों आदित्य उस अज्ञात प्रकाश के स्रोत की ओर बढ़ता गया, वह गुरुत्वाकर्षण का एक विचित्र और खौफनाक चक्रव्यूह अनुभव करने लगा। उसके पैरों तले की भूमि कांप रही थी और ऐसा लग रहा था मानो वह किसी जीवित, श्वास लेते हुए पर्वत के उदर में प्रवेश कर रहा हो। वातावरण में सदियों पुरानी सूखी मिट्टी और एक अलौकिक सुगंध का मिश्रण था। अचानक, वह धड़कन वाली ध्वनि एकदम रुक गई। सन्नाटा इतना गहरा और भयानक था कि आदित्य को अपने ही रक्त के प्रवाह की ध्वनि कानों में गूंजती हुई प्रतीत होने लगी। उसके सामने एक अत्यंत विशाल पाषाण वेदी थी, जिसके ऊपर हवा में तैरता हुआ एक अति-चमकदार मणिमंडित पत्थर था। वही था उस अकल्पनीय प्रकाश का स्रोत! परंतु, आदित्य की दृष्टि उस मणि से हटकर उस वेदी के पीछे पसरे हुए गहरे अंधकार में टिक गई। वहां दो विशाल, धधकते हुए नेत्र अचानक खुले। वे नेत्र किसी साधारण वन्य जीव के नहीं थे; उनमें युगों का अगाध ज्ञान और महाकाल का सा साक्षात क्रोध भरा था। एक भयंकर और अत्यंत धीमी गुर्राहट ने पूरी गुफा को नींव तक हिला दिया। गुफा की छत से बड़े-बड़े पत्थर टूटकर गिरने लगे। वह महाबली रक्षक जाग चुका था, और उसका मात्र एक प्रहार आदित्य को सदा के लिए राख में बदलने के लिए पर्याप्त था।

अध्याय ३: द्वापर युग का विस्मृत और रक्तरंजित अध्याय

प्राचीन ग्रंथों और 'श्रीमद्भागवत पुराण' के विस्मृत पन्नों में इसी 'स्यमंतक मणि' का विस्तार से उल्लेख मिलता है। यह वह दिव्य मणि थी जिसे साक्षात् भगवान सूर्यदेव ने अपने परम भक्त सत्राजित को प्रदान किया था। साधारण संसार केवल यही जानता है कि यह मणि प्रतिदिन आठ भार शुद्ध स्वर्ण उत्पन्न करती थी, परंतु यह इसका केवल एक भौतिक और अत्यंत क्षुद्र स्वरूप था। स्यमंतक मणि वास्तव में ब्रह्मांडीय ऊर्जा और सूर्य के ताप का एक अत्यंत सूक्ष्म परंतु प्रलयंकारी अंश थी। यह जिसके भी पास होती, यदि उसका हृदय पूर्णतः पवित्र और लोभमुक्त न हो, तो यह मणि उसके पूरे कुल का विनाश कर देती थी। द्वापर युग में इस मणि ने इतना रक्तपात मचाया कि प्रसेन की मृत्यु हुई और स्वयं भगवान श्री कृष्ण को भी हत्या के झूठे कलंक का सामना करना पड़ा। अंततः, इस प्रलयंकारी ऊर्जा को शांत करने और संसार की दूषित दृष्टि से ओझल करने के लिए इसे एक ऐसे रक्षक को सौंप दिया गया, जिसे काल भी पराजित नहीं कर सकता था। यह एक ऐसा अनसुलझा दिव्य रहस्य था, जिसे केवल कुछ सिद्ध योगी ही अपने ध्यान में देख पाते थे।

अध्याय ४: रक्षक का प्रकटीकरण और भीषण गर्जन

उस घने अंधकार से वह रक्षक अब पूर्णतः प्रकाश में आ चुका था। वह साक्षात् ऋक्षराज जाम्बवंत थे—त्रेता युग के वो अमर महाबली, जिन्होंने भगवान श्री राम के साथ लंका के महायुद्ध में भाग लिया था और जिन्हें कल्प के अंत तक चिरंजीवी होने का वरदान प्राप्त था। उनका शरीर किसी विशाल और अभेद्य पर्वत के समान था, और उनके रोम-रोम से एक अलौकिक तेज प्रस्फुटित हो रहा था। जाम्बवंत ने अपनी अत्यंत विशाल भुजाओं को उठाया और एक ऐसी गर्जना की जिसने आदित्य के कानों के पर्दों को सुन्न कर दिया। वे आदित्य की परीक्षा ले रहे थे। उस क्षण यदि आदित्य के मन में तनिक भी लोभ उत्पन्न होता, या उसने भूलवश भी आत्मरक्षा के लिए अपने शस्त्र को स्पर्श किया होता, तो वह क्षण उसके जीवन का अंतिम क्षण होता। परंतु, आदित्य का हृदय गंगा के जल के समान शुद्ध था। उसने उस भयंकर और प्राणघातक परिस्थिति में भी अपना धैर्य नहीं खोया। उसने अपने अस्त्र-शस्त्र भूमि पर त्याग दिए, अपने दोनों हाथ जोड़ लिए और उस अमर महाबली के सम्मुख अत्यंत श्रद्धा से नतमस्तक हो गया।

अध्याय ५: मणि का असली स्वरूप और अलौकिक रहस्य

आदित्य के इस पूर्ण समर्पण और हृदय की निश्छल शुद्धता को देखकर वह हवा में तैरती हुई स्यमंतक मणि अचानक परिवर्तित होने लगी। उसका वह भयंकर लाल रंग, जो विनाश, रक्तपात और लोभ का प्रतीक था, अब एक अत्यंत शांत, सुनहरी और शीतल आभा में बदल गया। जाम्बवंत का क्रोध भी उसी क्षण शांत हो गया। उन्होंने एक अत्यंत गंभीर और देववाणी के समान स्वर में कहा, "हे आदित्य! युगों पश्चात कोई मानव इस स्थान तक पहुंचने में सफल हुआ है और मेरे सम्मुख जीवित खड़ा है। यह मणि कोई साधारण पत्थर नहीं है; यह साक्षात् सूर्यदेव का स्पंदन है। यदि यह किसी भी अहंकारी या लोभी शासक के हाथ लग जाए, तो इसकी ऊर्जा संपूर्ण पृथ्वी को भस्म कर सकती है। इसकी स्वर्ण उत्पन्न करने की क्षमता तो मात्र अज्ञानियों को भ्रमित करने वाला इसका बाहरी आवरण है, इसका मूल स्वरूप तो विनाशकारी ब्रह्मांडीय अग्नि है।"

अध्याय ६: सत्य का दान और शाश्वत वचन

आदित्य को उस क्षण यह परम बोध हुआ कि संसार की सबसे मूल्यवान और शक्तिशाली वस्तुएं प्राप्त करने के लिए नहीं, अपितु उन्हें सुरक्षित और गुप्त रखने के लिए होती हैं। उसने जाम्बवंत से अत्यंत विनम्रतापूर्वक कहा, "हे महाबली! मेरी इस मणि को प्राप्त करने की कोई लालसा नहीं है। मैं तो केवल इस दिव्य रहस्य के दर्शन करना चाहता था। मेरा जीवन इस अलौकिक और विस्मृत सत्य को जानकर ही पूर्ण हो गया है।" जाम्बवंत उस युवा की अनासक्ति देखकर अत्यंत प्रसन्न हुए। उन्होंने आदित्य के मस्तक पर अपना विशाल हाथ रखकर उसे आशीर्वाद दिया और कहा कि आज से वह संसार में रहकर भी इस रहस्य का मौन रक्षक बनेगा। जैसे ही जाम्बवंत ने अपना हाथ उठाया, गुफा का वह मार्ग स्वतः ही अदृश्य होने लगा। विशाल पाषाण शिलाएं एक-दूसरे से ऐसे जुड़ गईं मानो वहां कभी कोई द्वार था ही नहीं।

अध्याय ७: काल के गर्भ में छिपा वो अजर-अमर सूर्य

जब सूर्य की पहली किरणें विंध्याचल की कठोर चोटियों पर पड़ीं, तो आदित्य उस पर्वत की तलहटी में एकांत खड़ा था। उसका मन एक ऐसे अथाह सागर के समान शांत था जिसमें कोई भी लहर न हो। आज भी, कई लोभी और लालची लोग स्यमंतक मणि की खोज में जंगलों की खाक छानते हैं, अपना जीवन व्यर्थ करते हैं, परंतु वे नहीं जानते कि वह दिव्य और प्रलयंकारी ऊर्जा साक्षात् जाम्बवंत के पहरे में पाताल के अंधकार में पूर्णतः सुरक्षित है। श्री मंदिर जी के इस पावन आख्यान का परम सत्य यही है कि ईश्वरीय शक्तियां और दिव्य रहस्य केवल उसी के सम्मुख अनावृत होते हैं, जिसका हृदय लोभ, मोह और अहंकार से पूर्णतः मुक्त हो। वह मणि आज भी उसी गहराई में धड़क रही है, एक ऐसे अनसुलझे रहस्य के रूप में, जिसे समय की गर्त ने सदा के लिए अपने भीतर समेट लिया है।