भक्त शिरोमणि हनुमान और प्रभु श्री राम का मिलन: अटूट भक्ति की संपूर्ण गाथा
अध्याय १: ऋष्यमूक पर्वत और सुग्रीव का भय त्रेतायुग की बात है, जब माता सीता के वियोग में भगवान श्री राम और लक्ष्मण वन-वन भटक रहे थे। भटकते हुए वे ऋष्यमूक पर्वत के पास पहुँचे। उस पर्वत पर वानर राज सुग्रीव अपने मंत्रियों के साथ निवास करते थे। सुग्रीव ने जब दो धनुर्धारी राजकुमारों को अपनी ओर आते देखा, तो वे भयभीत हो गए। उन्हें लगा कि उनके भाई बाली ने उन्हें मारने के लिए इन योद्धाओं को भेजा है। सुग्रीव ने अपने सबसे विश्वासपात्र और बुद्धिमान मंत्री हनुमान जी से कहा, "हनुमान, तुम ब्राह्मण का रूप धरकर जाओ और पता लगाओ कि ये दोनों तेजस्वी पुरुष कौन हैं और यहाँ किस प्रयोजन से आए हैं।"
अध्याय २: हनुमान जी का ब्राह्मण रूप और परिचय हनुमान जी सुग्रीव की आज्ञा मानकर एक वृद्ध ब्राह्मण का वेश धारण कर श्री राम के समीप पहुँचे। उन्होंने अत्यंत विनम्रता से पूछा, "हे वीर पुरुषों! आप कौन हैं? आपकी कान्ति तो देवताओं जैसी है, फिर भी आप तापस वेश में कांटों भरे रास्तों पर क्यों चल रहे हैं? क्या आप साक्षात त्रिदेवों में से कोई हैं?" हनुमान जी की वाणी में इतनी मिठास और व्याकरण की शुद्धता थी कि श्री राम तत्काल समझ गए कि यह कोई साधारण पुरुष नहीं है। राम जी ने लक्ष्मण से कहा, "लक्ष्मण, जो वेदों का ज्ञाता न हो, वह ऐसी शुद्ध वाणी नहीं बोल सकता।"
अध्याय ३: भक्ति का उदय और आत्म-समर्पण जब श्री राम ने अपना परिचय दिया कि वे अयोध्या नरेश दशरथ के पुत्र हैं और अपनी पत्नी सीता की खोज में वन में आए हैं, तो हनुमान जी का हृदय गदगद हो गया। उन्हें आभास हो गया कि जिनके नाम का वे स्मरण करते थे, वे साक्षात उनके आराध्य देव उनके सामने खड़े हैं। हनुमान जी ने अपना ब्राह्मण रूप त्याग दिया और अपने असली वानर रूप में आ गए। वे प्रभु के चरणों में गिर पड़े और उनके आँखों से प्रेम के अश्रु बहने लगे। हनुमान जी ने कहा, "हे नाथ! मैं तो अज्ञानी हूँ, मुझे पहचानने में देर हुई, पर आपने तो मुझे पहचान लिया। मैं आपका तुच्छ सेवक हूँ।"
अध्याय ४: सुग्रीव से मित्रता और राम-काज का संकल्प हनुमान जी ने श्री राम और लक्ष्मण को अपने कंधों पर बिठाया और ऋष्यमूक पर्वत के शिखर पर सुग्रीव के पास ले गए। वहाँ हनुमान जी ने अग्नि को साक्षी मानकर श्री राम और सुग्रीव की मित्रता करवाई। हनुमान जी ने संकल्प लिया कि वे अपना पूरा जीवन 'राम-काज' (राम के कार्य) में समर्पित कर देंगे। यहीं से सीता माता की खोज का अभियान शुरू हुआ। हनुमान जी ने अपनी चपलता, बुद्धि और शक्ति का परिचय देते हुए सुग्रीव की वानर सेना को संगठित किया और प्रभु राम के लिए जासूसों का जाल बिछा दिया।
अध्याय ५: लंका गमन और अतुलित बल का परिचय जब समुद्र लांघने की बात आई, तो हनुमान जी ने अपनी सोई हुई शक्तियों को जगाया। प्रभु राम की मुद्रिका (अंगूठी) लेकर वे एक ही छलांग में सौ योजन का समुद्र पार कर गए। लंका में सीता माता को ढूंढना, रावण के अभिमान को मिट्टी में मिलाना और लंका दहन करना—ये सब हनुमान जी की निस्वार्थ भक्ति के प्रमाण थे। हनुमान जी ने सिद्ध कर दिया कि यदि हृदय में 'राम' नाम का वास हो, तो संसार का कोई भी कार्य असंभव नहीं है। उन्होंने विभीषण को धर्म का मार्ग दिखाया और माता सीता को सांत्वना दी।
अध्याय ६: राम दरबार और अष्ट सिद्धि का वरदान युद्ध के पश्चात जब श्री राम का अयोध्या में राज्याभिषेक हुआ, तो उन्होंने सभी को उपहार दिए। लेकिन हनुमान जी के लिए प्रभु के पास कोई भौतिक वस्तु नहीं थी। सीता माता ने उन्हें अपनी बहुमूल्य मोतियों की माला दी, पर हनुमान जी ने हर मोती को तोड़कर देखा कि क्या उसमें 'राम' हैं। जब लोगों ने हँसी उड़ाई, तो हनुमान जी ने अपनी छाती चीर कर दिखा दी, जहाँ हृदय में श्री राम और माता सीता की छवि विराजमान थी। प्रभु राम ने उन्हें गले लगाया और 'अमरत्व' तथा 'अष्ट सिद्धि' का वरदान दिया। हनुमान जी आज भी जीवित हैं और जहाँ भी राम कथा होती है, वे अदृश्य रूप में वहाँ उपस्थित रहते हैं।