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स्वर्गारोहण: पांडवों की रहस्यमयी स्वर्ग यात्रा और युधिष्ठिर का अंतिम धर्म संकट

 







अध्याय १: राजपाट का त्याग और महाप्रस्थान

​कुरुक्षेत्र के महायुद्ध को छत्तीस वर्ष बीत चुके थे। जब पांडवों को भगवान श्री कृष्ण के देह त्याग और यदुवंश के सर्वनाश का समाचार मिला, तो उनके भीतर गहरा वैराग्य उत्पन्न हो गया। युधिष्ठिर समझ गए कि अब कलियुग का आरंभ हो चुका है। उन्होंने अपने पौत्र परीक्षित को हस्तिनापुर का राजा घोषित किया और संपूर्ण राजपाट त्याग दिया। पाँचों पांडव और द्रौपदी ने राजसी वस्त्रों का त्याग कर वल्कल वस्त्र धारण किए और हिमालय की ओर 'महाप्रस्थान' (अंतिम यात्रा) के लिए निकल पड़े। इस दुर्गम यात्रा में उनके साथ केवल एक अनजान श्वान (कुत्ता) ही चल रहा था।

​अध्याय २: द्रौपदी का पतन और अधूरा प्रेम

​पांडव हिमालय की दुर्गम और बर्फीली चोटियों को पार करते हुए मेरु पर्वत की ओर बढ़ रहे थे। मार्ग अत्यंत कठिन और जमा देने वाला था। अचानक, द्रौपदी लड़खड़ाईं और बर्फ पर गिर पड़ीं। भीम ने घबराकर पूछा, "भैया! द्रौपदी ने तो कभी कोई पाप नहीं किया, फिर वह शरीर सहित स्वर्ग क्यों नहीं जा सकीं?" बिना पीछे मुड़े युधिष्ठिर ने शांत स्वर में उत्तर दिया, "द्रौपदी ने हम पांचों को पति रूप में स्वीकार किया था, परंतु उनके हृदय में सर्वाधिक प्रेम और पक्षपात केवल अर्जुन के लिए था। उसी कर्म के कारण आज इनका पतन हुआ है।"

​अध्याय ३: सहदेव और नकुल का अहंकार

​यात्रा आगे बढ़ी, परंतु कुछ ही दूरी पर परम ज्ञानी सहदेव भी बर्फ में गिर पड़े। युधिष्ठिर ने बताया कि सहदेव को अपनी बुद्धिमत्ता और भविष्य देखने के ज्ञान पर अत्यधिक अहंकार था, जो उनके पतन का कारण बना। थोड़ी और ऊंचाई पर पहुँचने पर अत्यंत सुंदर नकुल भी अपने प्राण त्याग बैठे। धर्मराज युधिष्ठिर ने स्पष्ट किया कि नकुल को अपने रूप और सौंदर्य का बहुत अभिमान था। वे स्वयं को संसार में सबसे सुंदर मानते थे। यही सूक्ष्म अहंकार उनकी स्वर्ग यात्रा में बाधक बन गया।

​अध्याय ४: सर्वश्रेष्ठ धनुर्धर का मिथ्या अभिमान

​अब केवल तीन भाई, युधिष्ठिर और वह श्वान बचे थे। अचानक गांडीवधारी अर्जुन के कदम भी थम गए और वे बर्फ में धंस गए। भीम अत्यंत व्यथित हो उठे, क्योंकि अर्जुन अजेय थे। युधिष्ठिर ने दुख के साथ कहा, "अर्जुन ने एक ही दिन में शत्रुओं का नाश करने की प्रतिज्ञा की थी, जो वे कभी पूरी नहीं कर पाए। इसके अतिरिक्त, उन्हें अपने धनुर्विद्या के कौशल पर बहुत अधिक अभिमान हो गया था और उन्होंने अन्य सभी योद्धाओं का अपमान किया था। यह उसी मिथ्या अभिमान का फल है।"

​अध्याय ५: महाबली भीम का अंत

​अंततः, दस हजार हाथियों का बल रखने वाले गदाधारी भीम भी लड़खड़ाकर गिर पड़े। प्राण त्यागने से पहले उन्होंने कांपते हुए स्वर में पूछा, "हे धर्मराज! मेरा क्या अपराध था?" युधिष्ठिर ने उत्तर दिया, "तुम बहुत अधिक भोजन करते थे (अतिभोजी) और अपने बल के मद में दूसरों की शक्ति का सदैव उपहास उड़ाते थे। इसी कारण तुम भी इस यात्रा को पूरी नहीं कर सके।" ऐसा कहकर, बिना किसी शोक के, युधिष्ठिर और वह श्वान निरंतर आगे बढ़ते रहे।

​अध्याय ६: स्वर्ग का द्वार और श्वान की परीक्षा

​जब युधिष्ठिर मेरु पर्वत के सर्वोच्च शिखर पर पहुँचे, तो आकाश से एक दिव्य रथ लेकर साक्षात् देवराज इंद्र उतरे। इंद्र ने युधिष्ठिर का स्वागत किया और उनसे सदेह स्वर्ग चलने का आग्रह किया। युधिष्ठिर तैयार हो गए, परंतु उन्होंने कहा कि यह श्वान (कुत्ता) भी मेरे साथ जाएगा। इंद्र ने हँसते हुए कहा, "स्वर्ग में कुत्तों के लिए कोई स्थान नहीं है! इसे यहीं छोड़ दें।" परंतु युधिष्ठिर अपने धर्म पर अडिग रहे। उन्होंने स्पष्ट कह दिया, "जिसने मेरी इस कठिन यात्रा में मेरा साथ नहीं छोड़ा, मैं अपने सुख के लिए उसका त्याग नहीं कर सकता। यदि यह श्वान नहीं जाएगा, तो मैं भी स्वर्ग नहीं जाऊंगा।"

​अध्याय ७: साक्षात् धर्मराज और अंतिम सत्य

​युधिष्ठिर का यह अटल धर्म और करुणा देखकर वह श्वान अचानक एक दिव्य ज्योति में परिवर्तित हो गया। वह कोई साधारण श्वान नहीं, बल्कि साक्षात् धर्मराज (यम) थे, जो युधिष्ठिर की अंतिम परीक्षा ले रहे थे। धर्मराज अपने पुत्र युधिष्ठिर के धर्म से अत्यंत प्रसन्न हुए। उन्होंने कहा, "हे युधिष्ठिर! तुम इस ब्रह्मांड में एकमात्र ऐसे मनुष्य हो जो अपने सत्य और धर्म के कारण सदेह स्वर्ग जाने के अधिकारी हो।" इसके पश्चात, देवराज इंद्र के साथ युधिष्ठिर ने स्वर्ग में प्रवेश किया। इस प्रकार, द्वापर युग के सबसे महान शूरवीरों की सांसारिक यात्रा का यह परम रहस्यमयी अंत हुआ।