ब्रह्मांड का रक्तरंजित रहस्य: जब महाशून्य में कटा था सृष्टिकर्ता का शीश
अध्याय १: महाशून्य का कांपता हुआ वक्ष
सृष्टि के उस आदि काल में, जब समय ने अपनी पहली सांस भी नहीं ली थी, महाशून्य के मध्य एक अद्भुत और विशालकाय आकृति विराजमान थी। ये स्वयं सृष्टिकर्ता ब्रह्मा थे, जिनके उस समय चार नहीं, अपितु पांच मुख हुआ करते थे। उनका पांचवां मुख सीधे आकाश की ओर देखता था, और उसी मुख से एक ऐसी ध्वनि उत्पन्न हो रही थी जिसने संपूर्ण ब्रह्मांड के वक्षस्थल को कंपा दिया था। वह ध्वनि किसी मंत्र की नहीं, बल्कि असीमित अहंकार की थी। पांचवें मुख से निकलने वाले शब्द इतने कठोर और दर्प से भरे थे कि नवजात नक्षत्र भी भय से सिकुड़ने लगे थे। यह मुख उद्घोष कर रहा था कि उससे बड़ा, उससे श्रेष्ठ और उससे अधिक सामर्थ्यवान इस अनंत शून्यता में कोई अन्य नहीं है। अहंकार की यह अग्नि इतनी प्रचंड थी कि सृष्टि का प्रारंभिक संतुलन बिगड़ने लगा। अचानक, उस परम शून्यता में एक ऐसा अंधकार उभरने लगा, जो रात के अंधेरे से भी अधिक घना और भयानक था।
अध्याय २: प्रलय की वो भयंकर परछाई
उस घने अंधकार के बीच से एक ऐसी गर्जना हुई, जिसे सुनकर सातों लोक थरथरा उठे। यह गर्जना किसी प्राणी की नहीं, बल्कि स्वयं महाकाल के क्रोध की थी। उस कालिमा को चीरते हुए एक अति-भयंकर परछाई बाहर आई। उसकी आंखें जलते हुए अंगारों के समान लाल थीं, बाल बिखरे हुए थे, और उसके मुख से प्रलयंकारी ज्वालाएं निकल रही थीं। उसके एक हाथ में दंड था और दूसरे हाथ में एक ऐसा त्रिशूल, जिसकी नोक पर साक्षात् मृत्यु नृत्य कर रही थी। उसके साथ एक भयानक श्वान (कुत्ता) भी था, जिसकी गुर्राहट से दिशाएं फट रही थीं। वह परछाई धीमी गति से, परंतु एक ऐसे गुरुत्वाकर्षण के साथ आगे बढ़ रही थी कि सृष्टिकर्ता के पांचवें मुख से निकलने वाला अट्टहास अचानक सन्नाटे में बदल गया। वहां उपस्थित हर चेतना को यह आभास हो गया था कि आज कुछ ऐसा घटने वाला है, जो युगों-युगों तक एक खौफनाक स्मृति बनकर रह जाएगा।
अध्याय ३: शिव पुराण का वो विस्मृत पन्ना
शास्त्रों और प्राचीन पुराणों के गुप्त अध्यायों में वर्णित है कि एक बार परम शून्यता में सृष्टिकर्ता ब्रह्मा और पालनहार विष्णु के मध्य इस बात पर विवाद छिड़ गया कि दोनों में परम श्रेष्ठ कौन है। उनके इस विवाद को शांत करने के लिए दोनों के मध्य एक अनंत प्रकाश का स्तंभ, जिसे 'ज्योतिर्लिंग' कहा जाता है, प्रकट हुआ। दोनों ने उस स्तंभ का अंत खोजने का प्रयास किया, परंतु वे विफल रहे। जब वे वापस लौटे, तो भगवान विष्णु ने सत्य स्वीकार किया, परंतु ब्रह्मा जी के पांचवें मुख ने असत्य कह दिया कि उसने उस स्तंभ का शीर्ष खोज लिया है। उसी असत्य और असीमित अहंकार के गर्भ से शिव के क्रोध ने जन्म लिया था। वह भयंकर परछाई, जो अंधकार से प्रकट हुई थी, कोई और नहीं बल्कि साक्षात् भगवान शिव के क्रोधाग्नि से उत्पन्न 'कालभैरव' थे। यह अवतार केवल दंड देने के लिए ही रचा गया था।
अध्याय ४: भैरव की हुंकार और शीश का पतन
कालभैरव के शरीर से उठने वाला ताप इतना अधिक था कि आसपास का अंतरिक्ष पिघलने लगा था। उन्होंने बिना कोई शब्द कहे, एक भयानक हुंकार भरी। उनके बाएं हाथ के नाखून, जो किसी खंजर से भी अधिक तीक्ष्ण थे, बिजली की गति से आगे बढ़े। इससे पहले कि ब्रह्मा जी का वह अहंकारी पांचवां मुख कोई रक्षात्मक उपाय कर पाता, कालभैरव के नाखूनों ने उस मुख को धड़ से अलग कर दिया। महाशून्य में एक भयंकर चीख गूंज उठी। उस कटे हुए शीश से रक्त नहीं, बल्कि स्वर्ण के समान चमकने वाली ब्रह्मांडीय ऊर्जा बहने लगी। यह एक ऐसा दृश्य था जिसने संपूर्ण देवकुल और सूक्ष्म जगत को जड़ कर दिया था। ब्रह्मांड के इतिहास में यह पहला अवसर था जब किसी सृष्टिकर्ता को उसके असत्य और अभिमान का इतना कठोर दंड मिला था।
अध्याय ५: ब्रह्महत्या का अमिट कलंक
परंतु, प्रकृति का नियम हर चेतना के लिए समान है। जैसे ही वह पांचवां शीश कटकर कालभैरव के हाथों में गिरा, एक अकल्पनीय घटना घटी। वह शीश भैरव के बाएं हाथ से चिपक गया। ब्रह्मा, जो वेदों के ज्ञाता और सृष्टि के रचयिता थे, उनके खंडन के कारण एक अत्यंत भयानक और विकराल स्त्री रूपी परछाई वहां प्रकट हुई। यह 'ब्रह्महत्या' का पाप था। उस पाप ने कालभैरव को चारों ओर से घेर लिया। यह एक दिव्य और अनसुलझा नियम है कि जो न्याय करता है, उसे भी उस कर्म के भार को उठाना ही पड़ता है। महाकाल का वह उग्र स्वरूप, जिसने क्षण भर में अहंकार का नाश कर दिया था, अब उसी कटे हुए कपाल (कपाल अर्थात खोपड़ी) को हाथ में लिए ब्रह्महत्या के श्राप से ग्रसित हो चुका था।
अध्याय ६: महाकाल के पथ पर प्रायश्चित की यात्रा
कालभैरव उस कपाल को अपने हाथ से अलग करने का प्रयास करते रहे, परंतु वह उनके हाथ से ऐसे जुड़ गया था मानो उनके ही शरीर का अंग हो। वे ब्रह्महत्या के उस श्राप से मुक्ति पाने के लिए तीनों लोकों और अनंत तीर्थों में भटकने लगे। उनके पीछे-पीछे वह ब्रह्महत्या रूपी भयानक परछाई भी चलती रही। जहां-जहां भैरव के चरण पड़ते, वहां की भूमि उनके ताप से झुलस जाती। उन्होंने सैकड़ों वर्षों तक ब्रह्मांड का भ्रमण किया। उनका यह भ्रमण केवल एक श्राप का परिणाम नहीं था, बल्कि यह पूरे संसार के लिए एक जीवंत संदेश था कि असत्य और अभिमान का फल चाहे देवता हों या परम शक्ति, सभी को भुगतना पड़ता है। अंततः, भटकते हुए उनके कदम एक ऐसी नगरी की ओर मुड़ गए, जो साक्षात् शिव के त्रिशूल पर बसी थी।
अध्याय ७: काशी का कपालमोचन और शाश्वत शांति
जैसे ही कालभैरव ने मोक्षदायिनी काशी (वाराणसी) की पावन सीमा में अपना पहला कदम रखा, एक चमत्कार हुआ। ब्रह्महत्या रूपी वह भयंकर परछाई काशी की सीमा में प्रवेश करते ही चीखती हुई भस्म हो गई। उसी क्षण, भैरव के हाथ से चिपका हुआ ब्रह्मा का वह पांचवां कपाल स्वतः ही छूटकर भूमि पर गिर पड़ा। जिस स्थान पर वह कपाल गिरा, वह आज भी 'कपालमोचन तीर्थ' के नाम से विख्यात है। भगवान शिव की आज्ञा से कालभैरव वहीं काशी में स्थापित हो गए और उन्हें 'काशी के कोतवाल' का पद प्राप्त हुआ। श्री मंदिर जी की इस दिव्य अनसुलझी कथा का सार यही है कि अहंकार चाहे कितना भी ऊंचा क्यों न हो, उसे एक दिन महाकाल के सम्मुख कटना ही पड़ता है, और सत्य के उस प्रायश्चित का अंत केवल शिव की शरण में ही संभव है।