श्री मंदिर जी

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Shri Hanuman Mandir par aaj: हनुमान जी की लीला अपरंपार है

भगवान शिव और विषपान की विस्तृत कथा


अध्याय १: देव और दानव का समझौता

प्राचीन काल की बात है जब दुर्वासा ऋषि के श्राप के कारण इंद्र और अन्य देवता अपनी शक्ति और ऐश्वर्य खो चुके थे। दैत्यों ने स्वर्ग पर अधिकार कर लिया था। इस संकट से निकलने के लिए सभी देवता भगवान विष्णु के पास गए। विष्णु जी ने उन्हें सलाह दी कि वे असुरों के साथ मिलकर समुद्र मंथन करें, जिससे अमृत प्राप्त होगा। अमृत पीकर देवता अमर हो जाएंगे और अपनी खोई हुई शक्ति वापस पा लेंगे। असुर भी अमृत के लालच में देवताओं के साथ मिलकर मंथन करने के लिए तैयार हो गए। यह एक विशाल कार्य था जिसके लिए मंदराचल पर्वत को मथानी और नागराज वासुकी को रस्सी बनाया गया।

अध्याय २: समुद्र मंथन का आरंभ

मंथन शुरू हुआ तो एक तरफ से देवता और दूसरी तरफ से दानव वासुकी नाग को खींचने लगे। समुद्र मंथन से कई रत्न निकले जैसे कामधेनु गाय, उच्चैश्रवा घोड़ा, ऐरावत हाथी, कौस्तुभ मणि, कल्पवृक्ष और देवी लक्ष्मी। हर रत्न के निकलते ही देवताओं और असुरों में उसे पाने की होड़ मच जाती थी। लेकिन अभी तक वह अमृत नहीं निकला था जिसके लिए यह सब किया जा रहा था। मंथन की प्रक्रिया जैसे जैसे तेज हुई, समुद्र की गहराइयों से हलचल बढ़ने लगी। अचानक समुद्र के गर्भ से कुछ ऐसा निकला जिसने सबकी सांसें रोक दीं।

अध्याय ३: कालकूट विष का उदय

समुद्र से अत्यंत भयानक और जहरीला कालकूट विष निकला जिसे हलाहल भी कहा जाता है। यह विष इतना घातक था कि इसकी गर्मी और धुएं से दसों दिशाएं जलने लगीं। इसकी गंध मात्र से जीव जंतु बेहोश होने लगे। देवताओं और दैत्यों की त्वचा झुलसने लगी। सबको लगा कि अब सृष्टि का अंत निश्चित है क्योंकि यदि यह विष समुद्र से बाहर फैल गया तो कोई भी जीवित नहीं बचेगा। विष्णु जी और ब्रह्मा जी ने विचार किया कि इस विष को नष्ट करने की शक्ति केवल महादेव में ही है। सभी घबराए हुए देवता और असुर कैलाश पर्वत की ओर भागे।

अध्याय ४: महादेव की शरण

कैलाश पर पहुंचकर देवताओं ने करुण पुकार की। उन्होंने शिव जी से कहा कि हे प्रभु, इस विनाशकारी विष से संसार की रक्षा करें। शिव जी जो कि आशुतोष हैं और भक्तों के दुख देख नहीं सकते, उन्होंने तुरंत सहायता का आश्वासन दिया। माता पार्वती भी वहीं उपस्थित थीं। शिव जी ने उनकी ओर देखा और मुस्कुराते हुए पूछा कि क्या उन्हें इस विष को पी लेना चाहिए। माता पार्वती ने जगत कल्याण के लिए अपनी सहमति दी। शिव जी जानते थे कि यह विष साधारण नहीं है, फिर भी उन्होंने अपनी हथेली पर विष लिया और उसे पीना शुरू किया।

अध्याय ५: नीलकंठ नाम की उत्पत्ति

जैसे ही शिव जी ने विष का पान किया, माता पार्वती ने चिंतावश उनके गले को जोर से पकड़ लिया। वे नहीं चाहती थीं कि यह विष शिव जी के पेट में जाकर उन्हें हानि पहुंचाए। दूसरी ओर शिव जी ने भी उस विष को अपने मुख से बाहर नहीं निकलने दिया क्योंकि इससे बाहर की दुनिया नष्ट हो जाती। परिणाम स्वरूप वह विष शिव जी के कंठ में ही ठहर गया। उस अत्यंत जहरीले विष के प्रभाव से शिव जी का कोमल कंठ नीला पड़ गया। उनके शरीर का तापमान बढ़ने लगा। तभी से महादेव को नीलकंठ के नाम से पुकारा जाने लगा। विष की जलन को शांत करने के लिए देवताओं ने उन पर जल की वर्षा की और उनके मस्तक पर चंद्रमा को स्थान दिया गया।

अध्याय ६: सृष्टि की रक्षा और अमृत की प्राप्ति

भगवान शिव के इस महान त्याग के कारण संसार पर आया संकट टल गया। विष के शांत होने के बाद समुद्र मंथन फिर से शुरू हुआ। अंत में भगवान धन्वंतरि अमृत कलश लेकर प्रकट हुए। शिव जी ने बिना किसी स्वार्थ के केवल दूसरों के भले के लिए मृत्यु के विष को अपने गले में धारण किया। यह घटना हमें सिखाती है कि सच्चा ईश्वर वही है जो दूसरों के दुखों को अपना लेता है। शिव जी के इस रूप की पूजा आज भी पूरे विश्व में की जाती है। उनके गले का नीला रंग उनके असीम धैर्य और त्याग का प्रतीक बनकर रह गया।

अध्याय ७: आध्यात्मिक महत्व

शिव जी की यह कथा हमें यह संदेश देती है कि हमारे जीवन में भी कई बार विष रूपी कठिन परिस्थितियां आती हैं। हमें उन परिस्थितियों से घबराना नहीं चाहिए बल्कि शिव जी की तरह उन्हें धैर्य से संभालना चाहिए। शिव जी को जल और बेलपत्र चढ़ाने के पीछे भी यही भावना है कि हम उनके विष की जलन को कम करने का प्रयास कर रहे हैं। जो मनुष्य सच्चे मन से शिव जी की आराधना करता है, उसके जीवन के सारे कष्ट शिव जी स्वयं हर लेते हैं। इस कथा का श्रवण करने मात्र से व्यक्ति के पापों का नाश होता है और उसे शांति प्राप्त होती है।