धर्मसंकट या सच्ची भक्ति? विभीषण की उस रात की कहानी जिसने रामायण का रुख बदल दिया
संपादकीय
राम-राम दोस्तों, मैं आपका अपना आदित्य पोरवाल, एक बार फिर एक बेहद अद्भुत और प्रेरणादायक कथा के साथ आप सभी के सामने हाजिर हूँ। आज सुबह जब मैं एक शांत जगह पर बैठकर अपनी डायरी लिख रहा था, तो मन में यह विचार आया कि कई बार हम ऐसे हालात में फंस जाते हैं जहाँ हमें अपनों के गलत काम और सच्चाई के बीच किसी एक को चुनना पड़ता है। यह कहानी उसी गहरे धर्मसंकट से उपजी है, जो हमें सिखाती है कि सत्य के रास्ते पर चलने के लिए कभी-कभी कितना बड़ा बलिदान देना पड़ता है। आइए मित्रों, इस रहस्यमयी और ज्ञान से भरी कथा की ओर बढ़ते हैं।
सोने की लंका का वो रहस्यमयी कक्ष
प्राचीन काल की बात है, जब लंका सच में सोने की हुआ करती थी। उस नगरी की चमक ऐसी थी कि सूरज की रोशनी भी उसके सामने फीकी पड़ जाती थी। महलों में हर तरफ कीमती रत्न जड़े थे, रास्तों पर फूलों की महक थी और वहाँ के राजा की ताकत का डंका पूरे संसार में बजता था। लेकिन उस असीम माया और दिखावे के बीच एक कोना ऐसा भी था, जो बिल्कुल अलग था। यह एक ऐसा कक्ष था जहाँ ना तो अहंकार था और ना ही किसी बात का घमंड। वहाँ बस एक गहरी शांति थी।
यह कक्ष रावण के सबसे छोटे भाई विभीषण का था। महल के बाकी हिस्सों में जहाँ मदिरा और युद्ध की बातें होती थीं, वहीं इस कमरे के अंदर एक अजीब सा कौतूहल छिपा था। रात के उस सन्नाटे में, जब पूरी लंका सो रही होती थी, तब उस कमरे से एक बहुत ही धीमी और मीठी आवाज आती थी। कोई लगातार एक ऐसे नाम का जाप कर रहा था, जो उस नगरी के राजा का सबसे बड़ा दुश्मन था। आखिर ऐसा कौन सा आकर्षण था उस नाम में, जिसने इतने बड़े असुर कुल के राजकुमार को दुनिया भर के सुख छोड़कर संन्यासी जैसा जीवन जीने पर मजबूर कर दिया था?
जब चारों ओर विनाश का साया मंडराने लगा
समय बीतता गया और लंका के हालात बदलने लगे। एक दिन कुछ ऐसा हुआ जिसने पूरे असुर साम्राज्य की नींव हिला दी। एक वानर समुद्र पार करके आया और उसने पूरी सोने की लंका को आग में झोंक दिया। वह एक साफ संकेत था कि जिस शक्ति से रावण दुश्मनी मोल ले रहा है, वह कोई साधारण इंसान नहीं है। हर तरफ राख और धुएं की गंध थी। विभीषण अपने महल की छत से इस तबाही को देख रहे थे और उनका दिल बहुत भारी हो रहा था।
उन्हें साफ दिख रहा था कि उनके बड़े भाई का घमंड पूरे परिवार और नगरी को मौत के मुँह में धकेल रहा है। उनके मन में एक अजीब सी बेचैनी थी। एक तरफ उनका अपना बड़ा भाई था, जिसने उन्हें बचपन से पाला था, और दूसरी तरफ वो सत्य था जिसे वह अपने मन में भगवान मान चुके थे। वह समझ नहीं पा रहे थे कि क्या करें। क्या अपनों का साथ देकर गलत काम में भागीदार बनें, या फिर सच्चाई का साथ देकर दुनिया की नजरों में एक गद्दार कहलाएं? यह एक ऐसा धर्मसंकट था जिसका सामना शायद ही किसी ने किया हो।
अहंकार से भरी वो सुबह की सभा
अगली सुबह, रावण ने अपना दरबार सजाया। दरबार में सब लोग डरे हुए थे, लेकिन कोई भी रावण को सच बताने की हिम्मत नहीं कर रहा था। सब चापलूसी करने में लगे थे और रावण को यह विश्वास दिला रहे थे कि वह अजेय है और कोई भी उसका बाल बांका नहीं कर सकता। लेकिन विभीषण से यह झूठ बर्दाश्त नहीं हुआ। वह जानते थे कि अगर आज वह चुप रहे, तो कल यह पूरा कुल खत्म हो जाएगा।
उन्होंने अपने मन का डर निकाला, हाथ जोड़े और सभा के बीचों-बीच खड़े होकर अपने भाई से एक बहुत ही कड़वी लेकिन सच्ची बात कह दी। उन्होंने रावण से विनती की कि वह माता सीता को ससम्मान वापस लौटा दें, इसी में सबकी भलाई है। उन्होंने कहा कि अहंकार इंसान की मति भ्रष्ट कर देता है और यह जिद पूरे परिवार के लिए काल बन जाएगी। पूरी सभा में सन्नाटा छा गया। कोई सोच भी नहीं सकता था कि रावण के सामने उसी का भाई ऐसी बात कहने की हिम्मत करेगा।
क्या आप जानते थे? :
अपमान और एक कठोर निर्णय की घड़ी
विभीषण की बातें सुनकर रावण का गुस्सा सातवें आसमान पर पहुँच गया। उसे लगा कि उसका अपना खून ही उसे कायर कह रहा है और दुश्मनों का गुणगान कर रहा है। रावण ने अपनी गद्दी से उठकर विभीषण को बहुत बुरा-भला कहा और क्रोध में आकर अपने ही सगे भाई को भरी सभा में लात मार दी। वह लात सिर्फ विभीषण के शरीर पर नहीं लगी थी, बल्कि उस लात ने उन दोनों के बीच के हर रिश्ते, हर मोह और हर बंधन को हमेशा के लिए तोड़ दिया था।
उस भरे दरबार में जहाँ विभीषण का इतना बड़ा अपमान हुआ, उन्होंने कोई पलटकर जवाब नहीं दिया। वह चुपचाप उठे और उन्होंने समझ लिया कि जहाँ सच की कोई कद्र नहीं, जहाँ बड़े-बुजुर्गों और सच्चाई का अपमान होता है, वहाँ एक पल भी रुकना पाप है। उन्होंने अपने मुकुट को वहीं छोड़ दिया। यह कोई आम फैसला नहीं था। यह सारी सुख-सुविधाओं को लात मारकर एक ऐसे रास्ते पर निकलने का फैसला था, जहाँ कोई गारंटी नहीं थी कि सामने वाला उन्हें स्वीकार करेगा या नहीं।
समुद्र के ऊपर की वो अद्भुत यात्रा
विभीषण ने लंका छोड़ने का मन बना लिया। उनके साथ उनके चार सच्चे मंत्री भी हो लिए। जब वे आसमान के रास्ते समुद्र पार कर रहे थे, तो उनके मन में कई तरह के विचार आ रहे थे। क्या भगवान राम उन्हें अपनाएंगे? क्या वानर सेना उन्हें शत्रु समझकर मार देगी? आखिर वह उसी रावण के भाई थे जिसने सीता माता का हरण किया था।
नीचे विशाल समुद्र लहरें ले रहा था और ऊपर आसमान में विभीषण का मन लहरों से ज्यादा अशांत था। लेकिन उनके भीतर कहीं ना कहीं एक अटूट विश्वास था कि जो सच के रास्ते पर चलता है, ईश्वर उसे कभी अकेला नहीं छोड़ते। वह एक बहुत बड़ा जोखिम ले रहे थे। उन्होंने अपनी सारी धन-दौलत, परिवार, पहचान सब कुछ पीछे छोड़ दिया था सिर्फ एक आस में, कि उन्हें प्रभु के चरणों में जगह मिल जाए।
शरण की आस और संशय का अंत
जब विभीषण राम जी के शिविर के पास पहुँचे, तो वानर सेना में हलचल मच गई। सबने उन्हें दुश्मन का जासूस समझा। सुग्रीव और बाकी लोगों ने राम जी को सलाह दी कि इसे तुरंत बंदी बना लेना चाहिए या मार देना चाहिए, क्योंकि यह रावण का भाई है और इस पर भरोसा करना बहुत बड़ी भूल होगी। उस समय का माहौल बहुत तनावपूर्ण था।
लेकिन तब भगवान राम ने जो बात कही, वह आज भी दुनिया के लिए सबसे बड़ा उदाहरण है। राम जी ने मुस्कुराकर कहा कि जो कोई भी सच्चे मन से मेरी शरण में आता है, मैं उसे कभी वापस नहीं भेज सकता, फिर चाहे वह मेरा सबसे बड़ा शत्रु ही क्यों न हो। यह सुनते ही विभीषण की आँखों से आँसू छलक पड़े। वह दौड़कर गए और राम जी के चरणों में गिर पड़े। उस एक पल में, विभीषण की सारी थकान, सारा अपमान और सारा डर एक ही झटके में गायब हो गया। उन्हें वह शांति मिल गई जिसकी तलाश में वह सालों से उस सोने की लंका में तड़प रहे थे।
आज की जीवन शिक्षा: क्या हम अपने जीवन में सत्य का साथ देने की हिम्मत रखते हैं?
मेरे प्यारे दोस्तों, यह कहानी सिर्फ त्रेता युग के पन्नों में लिखी हुई कोई पुरानी बात नहीं है। अगर आप ध्यान से सोचें, तो आज 21वीं सदी में भी हम में से बहुत से लोग किसी न किसी 'लंका' में फँसे हुए हैं। हो सकता है आप किसी ऐसी कंपनी में काम करते हों जहाँ आपका बॉस आपसे झूठ बोलने या ग्राहकों को धोखा देने के लिए कहता हो। हो सकता है आपके परिवार में या दोस्तों में कोई ऐसा इंसान हो जो बहुत ताकतवर हो, लेकिन गलत काम करता हो। हम अक्सर अपनी नौकरी जाने के डर से, या परिवार वालों के तानों के डर से चुपचाप सब सहते रहते हैं। हम सोचते हैं कि जो चल रहा है चलने दो, बेवजह पंगे क्यों लेना।
लेकिन विभीषण हमें सिखाते हैं कि जहाँ गलत हो रहा है, जहाँ नैतिकता और सच्चाई का दम घुट रहा है, वहाँ चुप रहना भी बहुत बड़ा पाप है। कभी-कभी अपने आत्मसम्मान और सच्चाई को बचाने के लिए आपको उस 'कम्फर्ट जोन' या उस जहरीले माहौल को लात मारनी पड़ती है, भले ही इसके लिए आपको बिल्कुल अकेले ही क्यों ना खड़ा होना पड़े। जब आप विभीषण की तरह सच का दामन थामते हैं, तो शुरुआत में अपमान सहना पड़ सकता है, लोग आपको बेवकूफ कह सकते हैं, लेकिन अंत में ईश्वर उसी के साथ खड़ा होता है जो धर्म के साथ खड़ा होता है। इसलिए, अपनी जिंदगी में सही फैसले लेने से कभी मत डरिए, भले ही वह रास्ता कितना भी अकेला क्यों न हो।
