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श्री मंदिर जी

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तीनों लोकों को निगलने वाले तीन उड़ते हुए नगरों का महाविनाश

Lord Shiva destroying the three flying cities of Tripura with his divine power
Shivji And three Worlds

संपादकीय

राम-राम दोस्तों, आपके अपने आदित्य पोरवाल की ओर से आज की इस अलौकिक यात्रा में आप सभी का हृदय से स्वागत है। आज प्रातः काल जब मैं पुराने ग्रंथों का अध्ययन कर रहा था, तो अचानक मेरी दृष्टि उस प्रलयंकारी घटना पर पड़ी जिसने देवताओं को भी थर-थर कांपने पर मजबूर कर दिया था, और इसी ने मुझे यह कथा आप तक पहुँचाने के लिए प्रेरित किया, जिसका मुख्य सबक यह है कि जब अहंकार अपनी सारी सीमाएं लांघ जाता है, तो स्वयं महाकाल को अपना त्रिशूल उठाना ही पड़ता है। आइए मित्रों, समय के उस चक्र में पीछे चलते हैं और इस महा-रहस्य का पर्दाफाश करते हैं।


आसमान से टपकता हुआ महाकाल का साया

कल्पना कीजिए एक ऐसे युग की, जहाँ आसमान का रंग नीला नहीं, बल्कि खौफनाक लाल हो चुका था। धरती पर दिन के समय भी ऐसा गहन अंधकार छा जाता था, मानो सूर्य ने अपनी रोशनी देने से ही इनकार कर दिया हो। यह कोई साधारण ग्रहण या प्राकृतिक घटना नहीं थी, बल्कि आसमान में उड़ते हुए तीन विशालकाय नगरों की परछाई थी। ये नगर कोई छोटे-मोटे द्वीप नहीं थे, बल्कि इतने विशाल थे कि जब वे धरती के ऊपर से गुजरते, तो बड़े-बड़े पहाड़ भी उनके सामने तिनके के समान प्रतीत होते। एक नगर शुद्ध सोने का था, दूसरा चमकती हुई चाँदी का और तीसरा अभेद्य लोहे का। इन उड़ते हुए महानगरों से एक ऐसी रहस्यमयी और भयानक ऊर्जा निकल रही थी, जिसने पूरे ब्रह्मांड के संतुलन को हिला कर रख दिया था। धरती के प्राणी त्राहि-त्राहि कर रहे थे। समुद्र का जल उबलने लगा था और हवाओं में एक अनजाना सा भय घुल गया था। हर कोई बस आसमान की ओर देखकर यही सोच रहा था कि क्या यह सृष्टि का अंतिम समय आ चुका है?

देवताओं की बेबसी और अजेय होने का वरदान

इन प्रलयकारी उड़ते नगरों के स्वामी कोई और नहीं, बल्कि तारकासुर के तीन महाबलशाली पुत्र थे—तारकाक्ष, कमलाक्ष और विद्युन्माली। इन तीनों ने सदियों तक कठोर तपस्या करके सृष्टि के रचयिता ब्रह्मा जी को प्रसन्न कर लिया था और ऐसा वरदान मांग लिया था जिसने उन्हें लगभग अमर बना दिया। वरदान के प्रभाव से ही मय दानव ने उनके लिए ये तीन मायावी नगर बनाए थे, जिन्हें त्रिपुर कहा गया। ये नगर अपनी मर्जी से पूरे ब्रह्मांड में कहीं भी विचरण कर सकते थे। अहंकार के मद में अंधे होकर इन तीनों असुरों ने स्वर्ग लोक पर भी आक्रमण कर दिया। इंद्र का वज्र, वरुण का पाश और अग्नि देव की ज्वाला—सब कुछ इन उड़ते हुए नगरों की दीवारों से टकराकर लौट आता। देवता पूरी तरह से बेबस हो चुके थे। उनके पास कोई ऐसा अस्त्र या विद्या नहीं थी जो इन लोहे, चाँदी और सोने के अभेद्य किलों को भेद सके। सृष्टि का कोना-कोना उनके अत्याचारों से कांप उठा था और ऐसा लगने लगा था कि अब धर्म का सूरज हमेशा के लिए अस्त हो जाएगा।

वह असंभव शर्त जिसने मृत्यु को बाँध लिया था

इन तीनों असुरों ने मृत्यु को मात देने के लिए बड़ी ही चालाकी से वरदान मांगा था। उन्होंने शर्त रखी थी कि उनकी मृत्यु केवल उसी क्षण हो सकती है, जब हजार वर्षों में एक बार, एक विशेष नक्षत्र के दौरान, ये तीनों उड़ते हुए नगर अंतरिक्ष में घूमते हुए बिल्कुल एक सीध में आ जाएं। और केवल इतना ही नहीं, जब ये तीनों नगर एक सीध में हों, तो कोई एक ही बाण से इन तीनों नगरों को एक साथ भेद दे। यह शर्त इतनी असंभव थी कि इसे पूरा करने की कल्पना भी किसी के लिए दुःस्वप्न के समान थी। तीन अलग-अलग दिशाओं में तेज गति से उड़ने वाले नगरों का एक सीध में आना ही दुर्लभ था, और उस क्षणिक पल में एक ऐसा अचूक तीर चलाना जो तीनों को भस्म कर दे, किसी भी देवता के बस की बात नहीं थी। यही वह रहस्य था जिसने उन्हें अजेय बना दिया था और उनके भीतर यह भ्रम पैदा कर दिया था कि अब साक्षात काल भी उनका बाल बांका नहीं कर सकता।

ब्रह्मांड के सबसे विशाल रथ का निर्माण

जब देवताओं को यह आभास हुआ कि उनके बस में कुछ नहीं है, तो वे भागे-भागे कैलाश पर्वत की ओर गए। वहां समाधि में लीन त्रिलोकीनाथ भगवान शिव ने जब अपनी आंखें खोलीं, तो देवताओं की पुकार सुनकर उनका भाल क्रोध से तमतमा उठा। महादेव ने त्रिपुरों के विनाश का संकल्प लिया। परंतु उन मायावी नगरों का अंत करने के लिए कोई साधारण रथ या अस्त्र काम नहीं आ सकता था। तब देवताओं ने मिलकर ब्रह्मांड का सबसे विशाल और अलौकिक रथ तैयार किया। स्वयं पृथ्वी माता उस महा-रथ का आधार बनीं। सूर्य और चंद्रमा उस रथ के दो पहिए बने। हिमालय और मंदराचल जैसे विशाल पर्वतों को रथ के खंभे के रूप में स्थापित किया गया। स्वयं ब्रह्मा जी उस रथ के सारथी बने। महादेव के धनुष के रूप में सुमेरु पर्वत को लाया गया और बासुकी नाग को उस धनुष की प्रत्यंचा (डोरी) बनाया गया। और सबसे बड़ी बात, उस प्रलयंकारी बाण के रूप में स्वयं भगवान विष्णु विराजमान हुए और बाण की नोक पर अग्नि देव ने अपना स्थान ग्रहण किया। ऐसा दृश्य ब्रह्मांड ने न कभी देखा था और न भविष्य में कभी देखने वाला था।

कालचक्र का वह दुर्लभ पल

अब उस महा-रथ पर सवार होकर भगवान आशुतोष अंतरिक्ष में पहुँच चुके थे। उनके हाथों में सुमेरु पर्वत का वह विशाल धनुष था और बासुकी नाग फुंकार भर रहे थे। सब कुछ तैयार था, लेकिन महादेव को उस क्षण की प्रतीक्षा थी जो हजार वर्षों में केवल एक पल के लिए आने वाला था—पुष्य नक्षत्र का वह समय जब तीनों मायावी नगर एक सीध में आने वाले थे। अंतरिक्ष में सन्नाटा छा गया। देवता अपनी सांसें थामे उस दुर्लभ घड़ी का इंतजार कर रहे थे। एक-एक पल युगों के समान बीत रहा था। अचानक, तारों की दिशा बदलने लगी। ग्रहों का संरेखण उस रहस्यमयी कोण पर पहुँच गया। सोने का नगर, चाँदी का नगर और लोहे का नगर, जो अब तक अलग-अलग दिशाओं में तबाही मचा रहे थे, वे एक अदृश्य गुरुत्वाकर्षण के कारण एक दूसरे के पीछे आने लगे। अंतरिक्ष में एक भयानक गड़गड़ाहट गूँज उठी। वह क्षण आ गया था। तीनों नगर एक पूर्ण सीधी रेखा में संरेखित हो चुके थे।

पशुपतास्त्र की गूँज और शिव की वह मुस्कान

जैसे ही तीनों नगर एक सीध में आए, महादेव ने सुमेरु पर्वत के उस धनुष की प्रत्यंचा को अपने कानों तक खींच लिया। पूरी सृष्टि में एक भयानक खिंचाव महसूस हुआ। लेकिन ठीक उसी क्षण, जब बाण छूटने ही वाला था, महादेव के होठों पर एक हल्की सी रहस्यमयी मुस्कान उभर आई। देवताओं ने देखा कि उस महा-रथ के पहिए डगमगाने लगे थे, क्योंकि रथ बनाने वाले देवताओं के मन में यह अहंकार आ गया था कि उनके बनाए रथ के बिना शिव यह युद्ध नहीं जीत सकते। महादेव ने केवल अपनी उस मुस्कान मात्र से ही उन तीनों नगरों को भस्म करने की शक्ति उत्पन्न कर दी थी, यह जताने के लिए कि उन्हें किसी रथ या अस्त्र की आवश्यकता नहीं है। फिर भी, विधान का सम्मान करते हुए, महादेव ने वह पशुपतास्त्र छोड़ दिया। एक भयंकर गर्जना हुई जो पूरे ब्रह्मांड को चीरती हुई निकल गई। वह दिव्य बाण अंतरिक्ष को चीरते हुए आगे बढ़ा और एक ही झटके में उसने उन तीनों अजेय नगरों को बेध दिया। क्षण भर में ही वह महान साम्राज्य राख के ढेर में बदल गया।

भस्म से उपजा अंतिम सत्य

सोने, चाँदी और लोहे के वे अजेय नगर भस्म बनकर अंतरिक्ष से धरती पर गिरने लगे। वह भस्म कोई साधारण राख नहीं थी, बल्कि उसमें उन असुरों का तप और शिव की प्रचंड अग्नि का मिलाप था। जब वह राख धरती पर गिरी, तो महादेव का हृदय एक क्षण के लिए द्रवित हो उठा। क्योंकि वे असुर भी, अपनी सारी बुराइयों के बावजूद, भगवान शिव के ही परम भक्त थे। महादेव की आंखों से करुणा के कुछ अश्रु छलक पड़े जो धरती पर गिरे। मान्यता है कि इन्हीं अश्रुओं से पवित्र रुद्राक्ष के वृक्ष उत्पन्न हुए। यह घटना केवल एक युद्ध नहीं थी, बल्कि ब्रह्मांड का एक गहरा रहस्य और संदेश था। यह हमें सिखाता है कि जब शक्तियां मर्यादा भूल जाती हैं, तो विनाश निश्चित है। और यह भी कि महादेव केवल संहारक नहीं हैं, बल्कि वे करुणा के भी सागर हैं, जो अपने भक्तों के पतन पर शोक भी मनाते हैं। इसी के साथ त्रिपुरारी भगवान शिव ने तीनों लोकों में फिर से शांति और धर्म की स्थापना की।

अहंकार जब मर्यादा का उल्लंघन करता है, तो विनाश ही उसका एकमात्र परिणाम होता है।

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— श्री आदित्य पोरवाल, संपादक

"मैं इस साइट के माध्यम से सनातन ज्ञान की अनमोल कहानियों, विधि सामग्री, राशिफल और पंचांग को आप तक पहुँचाने का प्रयास कर रहा हूँ। मैं यह चाहता हूँ कि आप उन सभी को हमारी कहानियां शेयर करें जो जीवन की दौड़ में अपनी जड़ों से दूर हो गए हों, या जिन्hें चिंता है कि हमारे बच्चे अपनी संस्कृति कैसे सीखेंगे। मेरा उद्देश्य है कि इन कहानियों के माध्यम से धीरे-धीरे समस्त दुनिया में हमारे सनातनी अपनी जड़ों से जुड़ सकें।"