श्री मंदिर जी

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महादेव का तीसरा नेत्र और भस्म हुए कामदेव: वह दिन जब सृष्टि से प्रेम समाप्त हो गया

संपादकीय

नमस्कार मित्रों, मेरा नाम है आदित्य पोरवाल। आज सुबह जब मैं ध्यान में बैठा था, तो मन में एक विचार आया कि प्रेम और वैराग्य के बीच का संघर्ष कितना गहरा हो सकता है। हम सभी के जीवन में काम और इच्छाओं का बड़ा महत्व है, लेकिन जब यह सीमा पार कर जाए, तो विनाश निश्चित है। आज की यह कथा उसी शाश्वत सत्य को दर्शाती है, जहां स्वयं महादेव ने एक ऐसी अग्नि प्रकट की जिसने ब्रह्मांड की सबसे कोमल भावना को राख कर दिया। इससे हमें यह सबक मिलता है कि बिना नियंत्रण के कोई भी भावना विनाशकारी हो सकती है। आइए मित्रों, तो पूरी कहानी पढ़ते हैं।

कैलाश पर पसरा महाशून्य

सृष्टि के उस प्राचीन काल की बात है, जब तीनों लोकों में एक भयानक सन्नाटा पसरा हुआ था। देवराज इंद्र का सिंहासन डोल रहा था और स्वर्ग के देवता भय से कांप रहे थे। तारकासुर नाम के एक महाबली असुर ने वरदान प्राप्त कर लिया था कि उसकी मृत्यु केवल भगवान शिव के पुत्र के हाथों ही हो सकती है। लेकिन यह वरदान देवताओं के लिए किसी श्राप से कम नहीं था। भगवान शिव, जो परम वैरागी हैं, अपनी पत्नी सती के देह त्यागने के बाद से हिमालय की दुर्गम बर्फीली चोटियों पर एक ऐसी गहरी समाधि में लीन थे, जिसे तोड़ना ब्रह्मांड की किसी शक्ति के बस में नहीं था। कैलाश पर्वत का वातावरण इतना सुन्न और स्थिर था कि वहां हवा भी महादेव की अनुमति के बिना नहीं बहती थी। ऐसा प्रतीत होता था मानो पूरी सृष्टि की श्वास उस एक गुफा में जाकर ठहर गई हो। हर कोई जानता था कि यदि महादेव की यह समाधि नहीं टूटी, तो तारकासुर पूरे ब्रह्मांड को राख के ढेर में बदल देगा।

देवताओं का गुप्त षड्यंत्र

स्वर्गलोक में त्राहिमाम मचा हुआ था। सभी देवता एकत्रित हुए और गहन विचार-विमर्श करने लगे। महादेव के क्रोध से हर कोई परिचित था; उनकी समाधि भंग करने का अर्थ था सीधे मृत्यु को गले लगाना। तब देवराज इंद्र की दृष्टि ब्रह्मांड के सबसे सुंदर और कोमल देव पर पड़ी। वह थे कामदेव, प्रेम और इच्छाओं के स्वामी। जिनके बाणों से न कोई मनुष्य बच सका था और न ही कोई गंधर्व। देवताओं ने एक ऐसा षड्यंत्र रचा जो जितना आवश्यक था, उतना ही घातक भी। उन्होंने कामदेव से अनुनय-विनय की कि वह अपने अस्त्रों से महादेव के हृदय में माता पार्वती के प्रति प्रेम का बीज बो दें। कामदेव भीतर से सिहर उठे। वह जानते थे कि जिस परम योगी ने समस्त इच्छाओं को जीत लिया हो, उस पर काम के बाण चलाना स्वयं काल को निमंत्रण देना है। लेकिन त्रिलोक की रक्षा का भार उनके कंधों पर आ चुका था। अपने भीतर उठते हुए भीषण भय को दबाते हुए, उन्होंने अपने परम मित्र वसंत को साथ लिया और मृत्यु की ओर अपने कदम बढ़ा दिए।

वसंत का अकाल आगमन

जैसे ही कामदेव ने अपने मित्र वसंत के साथ कैलाश की सीमाओं में प्रवेश किया, प्रकृति का स्वरूप अचंभित करने वाला हो गया। जो कैलाश सदैव बर्फ की कठोर और सफेद चादर से ढका रहता था, वहां अचानक ही ऋतुओं का चक्र उलट गया। कठोर चट्टानों के बीच से कोमल हरे रंग की कोंपलें फूटने लगीं। ठंडी और जमा देने वाली हवाओं की जगह, मोगरे और चमेली की सुगंध से भरी मंद-मंद हवा बहने लगी। कोयल की मधुर ध्वनि उस भयानक सन्नाटे को चीरने लगी। यह एक ऐसा मायावी वसंत था जो प्रकृति के नियमों के विरुद्ध था। लेकिन यह सारा आकर्षण महादेव की गुफा के बाहर ही दम तोड़ रहा था। गुफा के भीतर अभी भी वही आदि अनंत शून्यता विराजमान थी। कामदेव का हृदय जोर से धड़क रहा था। उनकी गन्ने की धनुष और भ्रमरों की प्रत्यंचा आज उन्हें बहुत भारी लग रही थी। वह छिपते-छिपाते एक विशाल वृक्ष की ओट में जा पहुंचे, जहां से महादेव की दिव्य आकृति स्पष्ट दिखाई दे रही थी।

कामदेव का अमोघ बाण

उसी समय भाग्य ने एक अद्भुत खेल खेला। माता पार्वती, जो लंबे समय से महादेव की तपस्या कर रही थीं, वहां पूजन सामग्री लेकर उपस्थित हुईं। उनका सौंदर्य और भक्ति अप्रतिम थी। कामदेव समझ गए कि यही वह एकमात्र क्षण है जब उनका अस्त्र अपना कार्य कर सकता है। उन्होंने अपने तरकश से अपना सबसे अचूक और मायावी पुष्प बाण निकाला, जिसे 'हर्षण' कहा जाता था। उनके हाथ कांप रहे थे, माथे पर पसीने की बूंदें झलक रही थीं। उन्होंने आंखें बंद करके अपने इष्ट का स्मरण किया और पूरी शक्ति के साथ प्रत्यंचा को खींचा। सन्नाटे को चीरता हुआ वह फूलों का बाण सीधे महादेव के हृदय में जाकर समा गया। उस एक पल के लिए, जैसे पूरे ब्रह्मांड का समय रुक गया। महादेव के भीतर जो वैराग्य का महासागर था, उसमें एक हल्की सी लहर उत्पन्न हुई। उनका ध्यान भंग हो चुका था।

प्रलयंकारी तीसरे नेत्र की ज्वाला

ध्यान टूटते ही महादेव ने अपनी आंखें खोलीं। लेकिन उन आंखों में प्रेम का अंकुर नहीं, बल्कि प्रलय काल का ऐसा भीषण क्रोध भड़क रहा था जिसे देखकर दिशाएं भी कांप उठीं। महादेव समझ गए कि किसी ने छल से उनकी तपस्या को खंडित किया है। उनकी दृष्टि उस वृक्ष की ओर घूमी जिसके पीछे कामदेव छिपे थे। क्षण भर की भी देरी नहीं हुई, शिव के मस्तक पर स्थित उनका तीसरा नेत्र अचानक खुल गया। उस नेत्र से एक ऐसी ज्वाला प्रकट हुई जो सूर्य की हजारों किरणों से भी अधिक प्रखर और विनाशकारी थी। वह अग्नि कोई साधारण अग्नि नहीं थी, वह साक्षात काल की क्रोधाग्नि थी। कामदेव जब तक क्षमा मांगते या कुछ समझ पाते, उस ज्वाला ने उन्हें अपनी चपेट में ले लिया। पलक झपकते ही, वह सुंदर रूप, वह अजेय शक्ति और वह अहंकार, सब कुछ जलकर राख के एक छोटे से ढेर में बदल गया। ब्रह्मांड का सबसे शक्तिशाली योद्धा आज एक मुट्ठी भस्म बन चुका था।

रति का विलाप और सृष्टि में हाहाकार

जैसे ही कामदेव भस्म हुए, उनके पीछे से एक ऐसी चीख गूंजी जिसने पत्थरों का भी हृदय विदीर्ण कर दिया। वह कामदेव की पत्नी रति का विलाप था। रति अपने पति की राख से लिपटकर फूट-फूट कर रोने लगी। उनके रुदन से कैलाश का वह मायावी वसंत तुरंत मुरझा गया और वहां फिर से भयंकर शीत छा गई। लेकिन सबसे भयानक परिणाम तो सृष्टि में हुआ। कामदेव के जाते ही संसार से प्रेम, आकर्षण और इच्छा की भावना पूरी तरह से लुप्त हो गई। प्राणी मात्र एक दूसरे से विरक्त हो गए। जीवन की उत्पत्ति का चक्र अचानक रुक गया। ऐसा लगा मानो संसार की आत्मा ही किसी ने छीन ली हो। देवता अब अपने किए पर पछता रहे थे। उन्होंने त्रिलोक को बचाने के लिए तारकासुर का उपाय तो खोजा, लेकिन अनजाने में पूरी सृष्टि के विनाश का मार्ग खोल दिया था। सभी देवगण कांपते हुए महादेव के चरणों में गिर पड़े।

राख से पुनर्जन्म का वरदान

हाहाकार और रति के उस करुण विलाप ने अंततः महादेव के भीतर करुणा को जगाया। माता पार्वती भी रति के उस असीम दुख को देखकर भावुक हो गई थीं। शिव, जो जितने क्रोधी हैं उतने ही भोले भी हैं, उनका क्रोध शांत हुआ। उन्होंने रति को ढांढस बंधाते हुए कहा कि कामदेव ने परमार्थ के लिए अपने प्राणों की आहुति दी है, इसलिए उनका बलिदान व्यर्थ नहीं जाएगा। महादेव ने वरदान दिया कि आज से कामदेव बिना शरीर के, अर्थात 'अनंग' रूप में हर प्राणी के हृदय में वास करेंगे। वह दिखाई नहीं देंगे, लेकिन प्रेम की भावना के रूप में सदैव जीवित रहेंगे। उन्होंने यह भी वचन दिया कि भविष्य में द्वापर युग में, जब भगवान कृष्ण अवतार लेंगे, तब कामदेव उनके पुत्र प्रद्युम्न के रूप में पुनः शरीर धारण करेंगे। इस प्रकार, राख से फिर जीवन की आशा जगी और सृष्टि में प्रेम का संचार एक नए, अदृश्य रूप में पुनः प्रारंभ हुआ।

हम सभी जाने-अनजाने में एक ऐसी भयानक भूल कर रहे हैं जिसका अंजाम भारी पड़ सकता है। पछताने से बचना है, तो यह कहानी जरूर पढ़कर जाइए

आदित्य पोरवाल
— श्री आदित्य पोरवाल, संपादक

"मैं इस साइट के माध्यम से सनातन ज्ञान की अनमोल कहानियों, विधि सामग्री, राशिफल और पंचांग को आप तक पहुँचाने का प्रयास कर रहा हूँ। मैं यह चाहता हूँ कि आप उन सभी को हमारी कहानियाँ शेयर करें जो जीवन की दौड़ में अपनी जड़ों से दूर हो गए हैं, या जिन्हें चिंता है कि हमारे बच्चे अपनी संस्कृति कैसे सीखेंगे। मेरा उद्देश्य है कि इन कहानियों के माध्यम से धीरे-धीरे समस्त दुनिया में हमारे सनातनी अपनी जड़ों से जुड़ सकें।"