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लंका दहन का रहस्य: कैसे जलती हुई पूंछ से रावण का अहंकार राख हो गया

Lord Hanuman burning the golden city of Lanka with his blazing tail while destroying demon king Ravana pride forever.
लंका दहन के इस ऐतिहासिक प्रसंग में हनुमान जी ने अपनी पूंछ से रावण के अहंकार को पूरी तरह समाप्त कर दिया था।

संपादकीय

प्रणाम मित्रों, आपके अपने दोस्त आदित्य पोरवाल की ओर से आप सभी को सादर नमस्कार। आज हम रामायण के उस अद्भुत और रोमांचक अध्याय की चर्चा करने जा रहे हैं, जिसे सुनकर हर सनातनी के रोंगटे खड़े हो जाते हैं। जब पवनपुत्र हनुमान ने अपनी एक छोटी सी पूंछ से सोने की लंका को धू-धू कर जलते हुए देख लिया, तो वह सिर्फ एक प्रसंग नहीं बल्कि अधर्म पर धर्म की शाश्वत विजय का प्रमाण बन गया। आइए मित्रों, इस रहस्यमयी कथा की ओर बढ़ते हैं।

अशोक वाटिका का शांत वातावरण और वह एक भयंकर प्रतिज्ञा

पौराणिक काल में जब चारों तरफ राक्षसी अत्याचारों का अंधकार छाया हुआ था, तब अशोक वाटिका का वह शांत कोना एक अनूठी खामोशी में डूबा हुआ था। माता सीता के चरणों में अपनी निष्ठा अर्पित करने के बाद, पवनपुत्र हनुमान ने उस दिव्य लीला का आरंभ किया जिसने तीनों लोकों को हिलाकर रख दिया। फलों को खाने और पेड़ों को उखाड़ने का यह दृश्य साधारण नहीं था, बल्कि यह रावण की शक्ति के घमंड पर एक सीधा प्रहार था। वाटिका की हर एक पत्ती और हर एक डाल इस बात की गवाही दे रही थी कि अब लंका के विनाश का समय नजदीक आ चुका है।

मेघनाद का प्रहार और ब्रह्म अस्त्र का वह अदृश्य रहस्य

जब अशोक वाटिका में तबाही का मंजर चारों तरफ फैल गया, तो रावण की सेना में खलबली मच गई। एक के बाद एक राक्षस योद्धा धूल चाटने लगे, तब रणक्षेत्र में मेघनाद का आगमन हुआ। मेघनाद ने अपनी मायावी शक्तियों और अस्त्र-शस्त्रों का पूरा जोर लगा दिया, लेकिन पवनपुत्र को सामान्य युद्ध में हराना असंभव था। अंततः, मेघनाद ने ब्रह्माजी के अचूक अस्त्र यानी ब्रह्म अस्त्र का संधान किया। उस दिव्य अस्त्र के सामने हनुमान जी ने पूरी विनम्रता और मर्यादा का परिचय देते हुए स्वयं को समर्पित कर दिया, क्योंकि वे भली-भांति जानते थे कि उन्हें लंकापति रावण के दरबार तक पहुंचने का यही एकमात्र उचित मार्ग मिलेगा।

रावण की सभा में गूंजता वह निर्भीक स्वर और तेज

जब बंधे हुए हनुमान जी को रावण की विशाल और भव्य स्वर्ण सभा में लाया गया, तो वातावरण में एक अजीब सा तनाव व्याप्त हो गया। रावण के चेहरे पर अहंकार की चमक थी और उसकी आंखों में क्रोध की आग जल रही थी। लेकिन दूसरी ओर, हनुमान जी के चेहरे पर तनिक भी भय या चिंता का नामोनिशान नहीं था, बल्कि उनके मुखमंडल पर एक अलौकिक तेज चमक रहा था। उन्होंने बिना किसी डर के भरी सभा में रावण को उसके कुकर्मों का अहसास कराया और माता सीता को सम्मान सहित वापस लौटाने की चेतावनी दी। यह दृश्य देखकर वहां बैठे सभी दरबारी भी अचंभित रह गए कि आखिर यह साधारण सा दिखने वाला वानर इतना निडर कैसे हो सकता है।

पूंछ में आग लगने की वह घटना और राक्षसों का उपहास

रावण के आदेश पर जब राक्षसों ने हनुमान जी की पूंछ में कपड़ा लपेटकर उसमें आग लगाने का दुस्साहस किया, तो उन्हें जरा भी अंदाजा नहीं था कि वे किस आग को बुलावा दे रहे हैं। जैसे-जैसे पूंछ में तेल और कपड़े लपेटे जा रहे थे, रावण और उसकी सभा के लोग जोर-जोर से हंस रहे थे और वानर की इस स्थिति का उपहास उड़ा रहे थे। लेकिन वे इस बात से पूरी तरह अनजान थे कि यह आग किसी साधारण पूंछ में नहीं, बल्कि संपूर्ण लंका के विनाश की शुरुआत बन रही थी। उस समय का वह मौन और रहस्यमयी वातावरण किसी बड़े तूफान के आने का संकेत दे रहा था।

जब पवनपुत्र के एक छलांग ने सोने की लंका को हिला दिया

पूंछ में आग लगते ही हनुमान जी ने अपने विराट रूप का स्मरण किया और एक ही पल में अपने बंधनों को तोड़कर हवा में उड़ चले। वे महल की एक छत से दूसरी छत पर कूदने लगे और देखते ही देखते रावण की स्वर्णनगरी लंका का एक-एक कोना आग की लपटों से घिर गया। राक्षसों में चीख-पुकार मच गई और जो रावण अपनी शक्ति पर सबसे ज्यादा घमंड करता था, वह अपनी आंखों के सामने अपनी पूरी नगरी को जलते हुए देखने के लिए विवश हो गया। यह केवल आग का तांडव नहीं था, बल्कि यह भगवान श्रीराम के पराक्रम और भक्तों की अटूट निष्ठा का वह दिव्य प्रमाण था जिसने इतिहास रच दिया।

राख के ढेर में बदला अहंकार और भक्तों के लिए प्रेरणा

पूरी लंका जब जलकर राख के ढेर में बदल गई, तब वहां केवल एक अजीब सी शांति और सच्चाई का प्रकाश शेष बचा था। रावण का वह अहंकार जो खुद को अमर समझता था, पल भर में उस आग में स्वाहा हो गया। यह कथा हमें यह सिखाती है कि चाहे दुनिया में कितना भी बड़ा अधर्मी या अहंकारी क्यों न बैठा हो, सत्य और धर्म की एक छोटी सी चिंगारी उसके पूरे साम्राज्य को मिटाने के लिए काफी होती है। जब भी मनुष्य अपने जीवन में घमंड या अहंकार के मार्ग पर चलता है, तो उसका अंत भी इसी लंका की तरह निश्चित हो जाता है।

आदित्य पोरवाल
— श्री आदित्य पोरवाल, संपादक

"मैं इस साइट के माध्यम से सनातन ज्ञान की अनमोल कहानियों, विधि सामग्री, राशिफल और पंचांग को आप तक पहुँचाने का प्रयास कर रहा हूँ। मैं यह चाहता हूँ कि आप उन सभी को हमारी कहानियाँ शेयर करें जो जीवन की दौड़ में अपनी जड़ों से दूर हो गए हैं, या जिन्हें चिंता है कि हमारे बच्चे अपनी संस्कृति कैसे सीखेंगे। मेरा उद्देश्य है कि इन कहानियों के माध्यम से धीरे-धीरे समस्त दुनिया में हमारे सनातनी अपनी जड़ों से जुड़ सकें।"