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मथुरा का वह अंधकारमय रहस्य: जब स्वयं भगवान ने लिया अवतार

 

अध्याय 1: एक विवाह और मृत्यु की भविष्यवाणी

मथुरा नरेश उग्रसेन के पुत्र, क्रूर कंस ने अपनी अत्यंत प्रिय बहन देवकी का विवाह यदुवंशी वसुदेव से कराया। विदाई के समय कंस स्वयं प्रेमवश उनका रथ हांक रहा था। परंतु तभी आकाश में बादलों की भयंकर गर्जना हुई और एक स्पष्ट आकाशवाणी गूंज उठी— "अरे मूर्ख कंस! जिस बहन को तू इतने प्रेम से विदा कर रहा है, उसी का आठवां पुत्र तेरा काल बनेगा।" यह सुनते ही कंस का सारा प्रेम क्षण भर में क्रोध में बदल गया। उसने म्यान से अपनी चमकदार तलवार निकाल ली और देवकी के केश पकड़ लिए। क्या देवकी के विवाह का दिन ही उसकी मृत्यु का दिन बन जाएगा?

अध्याय 2: कारागार का सन्नाटा और खून के आंसू

वसुदेव ने अपने प्राणों की बाजी लगाकर कंस को वचन दिया कि वे अपनी हर संतान उसे सौंप देंगे। कंस ने दोनों को मथुरा के उस अभेद्य दुर्ग की कालकोठरी में बंदी बना दिया। समय बीतता गया और उस पापी ने एक-एक कर देवकी के छह नवजात शिशुओं को पत्थरों पर पटक कर मार डाला। कारागार की दीवारों ने अनगिनत चीखें सुनीं। सातवें गर्भ में शेषनाग का अंश था, जिसे योगमाया ने रोहिणी के गर्भ में स्थापित कर दिया। अब आठवें गर्भ का समय आया। वसुदेव ने पवित्र जल से आचमन कर ईश्वर का ध्यान किया। भाद्रपद मास के कृष्ण पक्ष की वह तूफानी रात आ चुकी थी... क्या आठवां पुत्र भी कंस की क्रूरता का शिकार होगा?

अध्याय 3: मध्यरात्रि का वह अलौकिक चमत्कार

अष्टमी की वह काली और भयानक रात थी। मूसलाधार वर्षा हो रही थी। ठीक मध्यरात्रि में कारागार अचानक एक दिव्य प्रकाश से जगमगा उठा। वहां एक साधारण शिशु नहीं, बल्कि चतुर्भुज रूप में स्वयं भगवान विष्णु प्रकट हुए, जिनकी कांति से कोठरी एक स्वर्णिम दीपक की भांति रोशन हो गई। भगवान ने वसुदेव और देवकी को अपने पूर्व जन्मों का स्मरण कराया और फिर एक साधारण नवजात शिशु का रूप ले लिया। चमत्कारिक रूप से सभी पहरेदार गहरी निद्रा में चले गए और लोहे की भारी बेड़ियां व ताले अपने आप टूट गए। वसुदेव ने शिशु को सूप में रख तो लिया, परंतु बाहर प्रलयंकारी उफान पर बहती यमुना उनका रास्ता रोके खड़ी थी। क्या वे इस जल प्रलय को पार कर पाएंगे?

अध्याय 4: यमुना का उफान और शेषनाग की छाया

शिशु को सिर पर उठाए वसुदेव तूफानी रात में यमुना तट पर पहुंचे। नदी उफान पर थी और लहरें भयंकर रूप ले रही थीं। जैसे ही वसुदेव ने जल में प्रवेश किया, जलस्तर बढ़ने लगा। परंतु तभी अनंत शेषनाग जल से प्रकट हुए और उन्होंने अपने फनों का छत्र बनाकर शिशु को वर्षा से बचा लिया। यमुना की लहरें ऊपर उठीं, केवल भगवान के चरण स्पर्श किए और फिर रास्ता देते हुए शांत हो गईं। वसुदेव ने सुरक्षित नदी पार कर ली और वे गोकुल के मुखिया नंदराज के घर पहुंच गए। गोकुल में रात का सन्नाटा पसरा था... लेकिन क्या बिना किसी के जागे देवकी के पुत्र को यशोदा की पुत्री से बदलना संभव हो पाएगा?

अध्याय 5: नंद भवन का रहस्यमयी परिवर्तन

नंद भवन में चारों ओर शांति थी। कक्ष में सुगंधित धूप की मनमोहक महक फैली हुई थी। यशोदा गहरी नींद में थीं और उनके पास एक नवजात कन्या लेटी थी। वसुदेव ने कांपते हाथों से अपने पुत्र को यशोदा के पास लिटा दिया और उस कन्या को उठा लिया। वे उसी भयानक मार्ग से वापस मथुरा के कारागार आ गए। जैसे ही उन्होंने कन्या को देवकी के पास रखा, कारागार के दरवाजे स्वतः बंद हो गए, ताले लग गए और पहरेदार जाग उठे। नवजात के रोने की आवाज सुनकर रक्षकों ने घंटा बजाकर खतरे की सूचना दी। कंस को आठवें संतान के जन्म की सूचना मिल चुकी है... मृत्यु अब तेजी से कारागार की ओर दौड़ रही है!

अध्याय 6: योगमाया की गर्जना और कंस का भय

सूचना पाते ही कंस पागलों की तरह भागता हुआ कारागार पहुंचा। देवकी ने गिड़गिड़ाते हुए कहा कि यह तो एक कन्या है, परंतु कंस ने किसी की न सुनी। उसने कन्या के पैर पकड़े और उसे चट्टान पर पटकना चाहा। लेकिन वह साधारण कन्या नहीं थी! वह कंस के हाथों से छूटकर आकाश में उड़ गई और अष्टभुजा देवी योगमाया के रूप में प्रकट हुई। "तुझे मारने वाला तो गोकुल में जन्म ले चुका है!" यह कहकर देवी अंतर्ध्यान हो गईं। भय से कांपते कंस के रक्षकों ने अपनी गदा और अस्त्र उठा लिए। कंस ने तुरंत अपने सबसे तेज अश्वों को रथ में जोतने का आदेश दिया। कंस के सबसे भयानक राक्षस अब उस शिशु को खोजने निकल चुके हैं... क्या नन्हा बालक उन खूंखार दैत्यों से बच पाएगा?

अध्याय 7: गोकुल में आनंद और नवयुग का आरंभ

इधर गोकुल में सुबह होते ही जब यशोदा ने अपने नीले वर्ण वाले अत्यंत सुंदर पुत्र को देखा, तो पूरे नंदगांव में आनंद की लहर दौड़ गई। हर घर के द्वार पर मंगल कलश स्थापित किए गए। पवित्र ऋषियों ने गले में रुद्राक्ष धारण कर स्वस्तिवाचन किया और शुद्ध कपूर से भगवान की प्रथम आरती उतारी गई। ढोल-नगाड़ों की थाप पर सारा गोकुल झूम उठा था। द्वापर युग में धर्म की पुनः स्थापना करने के लिए स्वयं नारायण ने श्रीकृष्ण के रूप में अवतार ले लिया था।