श्री मंदिर जी

ANNOUNCEMENT
NEW - Category of content clearly shown as - STORY, PANCHANG, VIDHI, LYRICS, Q n A

सीना चीरकर दिखाए सिया-राम: जब हनुमान जी ने मोतियों की माला तोड़ दी


संपादकीय

हर-हर महादेव मित्रों! आपका अपना आदित्य पोरवाल एक बार फिर आपके लिए एक दिव्य कथा लेकर उपस्थित हुआ है। मुझे सदैव ऐसा प्रतीत होता है कि ब्रह्मांड की सबसे बड़ी शक्तियां हमारे भीतर ही विद्यमान हैं, बस हमें उन्हें पहचानने के लिए एक उचित दिशा की आवश्यकता होती है। हमारी पौराणिक गाथाएं उसी दिशा का कार्य करती हैं और हमें जीवन की वास्तविकता से परिचित कराती हैं। आज मैं जो प्रसंग लेकर आया हूँ, वह आपके सोचने के दृष्टिकोण को एक नई ऊंचाई प्रदान करेगा। तो चलिए दोस्तों, बिना रुके आज की इस ज्ञान से भरी अद्भुत कहानी का आरंभ करते हैं।

विभीषण का राज्याभिषेक और उपहारों का वितरण

​लंका विजय के बाद भगवान राम ने विभीषण को लंका का राजा बना दिया। इसके बाद राम, सीता और लक्ष्मण सहित सभी वानर सेना वापस अयोध्या लौट आए। अयोध्या में राम का भव्य राज्याभिषेक हुआ। इस शुभ अवसर पर राम और सीता ने सभी वीरों को उनके अतुलनीय योगदान के लिए बहुमूल्य उपहार और आभूषण भेंट किए।

माता सीता का विशेष उपहार

​माता सीता ने अपने गले से एक बेहद कीमती और दिव्य मोतियों की माला उतारी। वे यह माला किसी ऐसे व्यक्ति को देना चाहती थीं जो इसके सबसे ज्यादा योग्य हो। भगवान राम के संकेत पर माता सीता ने वह अमूल्य माला अपने परम भक्त हनुमान जी को भेंट कर दी। हनुमान जी माता का यह उपहार पाकर अत्यंत प्रसन्न हुए।

मोतियों को दांतों से तोड़ना

​माला मिलने के बाद हनुमान जी राजसभा के एक कोने में जाकर बैठ गए और माला के एक-एक मोती को अपने दांतों से तोड़ने लगे। मोती तोड़ने के बाद वे उसे ध्यान से देखते और फिर निराश होकर जमीन पर फेंक देते। पूरी राजसभा और अन्य वानर हनुमान जी की इस विचित्र हरकत को देखकर हैरान थे।

राजसभा में उठा सवाल

​जब विभीषण और अन्य दरबारियों से नहीं रहा गया, तो उन्होंने हनुमान जी से पूछ ही लिया, "हे पवनपुत्र! माता सीता द्वारा दी गई इतनी बहुमूल्य माला को आप इस तरह दांतों से तोड़कर नष्ट क्यों कर रहे हैं?" विभीषण ने कहा कि यह तो माता सीता के प्रेम और उनके अमूल्य उपहार का सीधा अपमान है।

हनुमान जी का अद्भुत उत्तर

​हनुमान जी ने बहुत ही सरलता से उत्तर दिया, "मेरे लिए कोई भी वस्तु तभी मूल्यवान है जब उसमें मेरे प्रभु श्री राम और माता सीता का वास हो। मैं इन मोतियों को तोड़कर यही देख रहा हूँ कि क्या इनके अंदर मेरे प्रभु हैं? लेकिन मुझे इनमें कहीं भी अपने राम दिखाई नहीं दे रहे, इसलिए यह माला मेरे किसी काम की नहीं है।"

विभीषण का व्यंग्य और हनुमान जी का सीना चीरना

​इस पर विभीषण ने थोड़ा व्यंग्य करते हुए पूछा, "अगर ऐसा है, तो आपके शरीर में भी तो राम नहीं दिख रहे हैं, फिर आप इस शरीर को क्यों धारण किए हुए हैं?" यह सुनते ही हनुमान जी ने बिना एक क्षण गंवाए अपने दोनों हाथों से अपने ही सीने को चीर दिया। राजसभा में बैठे सभी लोग यह दृश्य देखकर सन्न रह गए।

हृदय में साक्षात सिया-राम के दर्शन

​जैसे ही हनुमान जी ने अपना सीना चीरा, वहां उपस्थित सभी लोगों ने देखा कि उनके हृदय के ठीक बीचों-बीच भगवान राम और माता सीता की साक्षात छवि विराजमान है। हनुमान जी का रोम-रोम राम के नाम से गूंज रहा था। यह अद्भुत दृश्य देखकर पूरी राजसभा नतमस्तक हो गई और भगवान राम ने तुरंत उठकर अपने अनन्य भक्त हनुमान को गले लगा लिया।


एक ऐसा पर्दाफाश जो आपके सोचने का नज़रिया और दिमाग के सारे तार हिला कर रख देगा। यकीन न हो तो, यह कहानी जरूर पढ़कर जाइए

आदित्य पोरवाल
— श्री आदित्य पोरवाल, संपादक

"मैं इस साइट के माध्यम से सनातन ज्ञान की अनमोल कहानियों, विधि सामग्री, राशिफल और पंचांग को आप तक पहुँचाने का प्रयास कर रहा हूँ। मैं यह चाहता हूँ कि आप उन सभी को हमारी कहानियाँ शेयर करें जो जीवन की दौड़ में अपनी जड़ों से दूर हो गए हैं, या जिन्हें चिंता है कि हमारे बच्चे अपनी संस्कृति कैसे सीखेंगे। मेरा उद्देश्य है कि इन कहानियों के माध्यम से धीरे-धीरे समस्त दुनिया में हमारे सनातनी अपनी जड़ों से जुड़ सकें।"