श्री मंदिर जी

BREAKING NEWS
Shri Hanuman Mandir par aaj: Three New Stories published today;

रामायण का अनसुना रहस्य: जब माता सीता ने लिया था 'महाकाली' का विकराल रूप

 

अध्याय १: लंका विजय के बाद का वो अज्ञात खौफ

लंका के युद्ध में दशानन रावण के वध के बाद, भगवान राम माता सीता के साथ अयोध्या लौट आए थे। चारों ओर खुशियाँ और रामराज्य की स्थापना का जश्न था। लेकिन एक दिन ऋषियों की एक सभा में यह बात उठी कि लंका का रावण तो केवल दस सिरों वाला था, लेकिन उसका एक बड़ा भाई भी है—'सहस्त्र रावण'। सहस्त्र रावण के एक हज़ार सिर और दो हज़ार भुजाएं थीं। वह दशानन रावण से भी सौ गुना अधिक शक्तिशाली, क्रूर और अजेय था। उसका वध किए बिना ब्रह्मांड पूरी तरह सुरक्षित नहीं था।

अध्याय २: पुष्कर द्वीप की ओर श्रीराम का प्रस्थान

सहस्त्र रावण पुष्कर नामक एक अत्यंत रहस्यमयी और मायावी द्वीप पर राज करता था। श्रीराम ने ब्रह्मांड की रक्षा के लिए उसे समाप्त करने का निर्णय लिया। उन्होंने अपनी विशाल वानर सेना, हनुमान, सुग्रीव, विभीषण और लक्ष्मण के साथ पुष्कर द्वीप की ओर प्रस्थान किया। माता सीता ने भी इस युद्ध में उनके साथ जाने की जिद की, और श्रीराम उन्हें मना नहीं कर सके। जब राम की सेना पुष्कर द्वीप पहुँची, तो वहाँ का भयावह और आसुरी वातावरण देखकर बड़े-बड़े योद्धाओं के रोंगटे खड़े हो गए।

अध्याय ३: सहस्त्र रावण का प्रलयंकारी प्रहार

युद्ध का बिगुल बजते ही सहस्त्र रावण अपनी दो हज़ार भुजाओं में भयंकर अस्त्र-शस्त्र लेकर रणभूमि में आ गया। उसका आकार किसी विशाल पर्वत जैसा था। उसने जैसे ही अपने धनुष से एक बाण छोड़ा, उस बाण की आंधी से सुग्रीव, विभीषण और यहाँ तक कि महाबली हनुमान भी उड़कर सैकड़ों योजन दूर जा गिरे। राम की पूरी वानर सेना क्षण भर में तितर-बितर हो गई। अब रणभूमि में केवल श्रीराम बचे थे।

अध्याय ४: श्रीराम का मूर्छित होना और देवताओं का हाहाकार

श्रीराम ने सहस्त्र रावण पर अपने सबसे शक्तिशाली दिव्यास्त्रों—ब्रह्मास्त्र, पाशुपतास्त्र और नारायणास्त्र—का प्रयोग किया। लेकिन उस महादानव पर किसी भी अस्त्र का कोई असर नहीं हुआ। अंततः, सहस्त्र रावण ने एक ऐसा भयानक और मायावी शक्ति बाण चलाया जो सीधे श्रीराम के वक्षस्थल (सीने) पर जाकर लगा। ब्रह्मांड के स्वामी श्रीराम उस प्रहार को सह नहीं पाए और रणभूमि में मूर्छित होकर गिर पड़े। यह दृश्य देखकर आकाश में हाहाकार मच गया। देवता कांपने लगे, क्योंकि अब ब्रह्मांड का विनाश निश्चित लग रहा था।

अध्याय ५: रणभूमि में वो भयंकर गर्जना

मूर्छित श्रीराम के पास ही माता सीता रथ पर बैठी थीं। जब उन्होंने अपने स्वामी को धरती पर अचेत पड़ा देखा, तो उनके भीतर की कोमलता और शांति अचानक वाष्प बनकर उड़ गई। उस शांत और सौम्य सीता के भीतर से एक ऐसी भयंकर गर्जना निकली, जिससे पुष्कर द्वीप की धरती फट गई और समुद्र का पानी उबलने लगा। माता सीता का शरीर एकाएक बढ़ने लगा और उनका रंग घने अंधकार जैसा काला पड़ गया।

अध्याय ६: 'महाकाली' का अवतार और सहस्त्र रावण का अंत

देखते ही देखते माता सीता ने साक्षात् 'महाकाली' का अत्यंत विकराल और डरावना रूप धारण कर लिया। उनके हाथों में खप्पर और खड्ग (तलवार) आ गए, गले में मुंडमाला पड़ गई और उनकी आँखें धधकती हुई आग जैसी लाल हो गईं। महाकाली ने रणभूमि में उतरकर एक ऐसी भयानक चीख मारी कि सहस्त्र रावण के आधे सैनिक उसी चीख से भस्म हो गए। इसके बाद महाकाली ने सहस्त्र रावण पर हमला कर दिया। मात्र कुछ ही पलों में उन्होंने अपनी तलवार से उस अजेय दानव के एक हज़ार सिर धड़ से अलग कर दिए और उसका रक्त पीने लगीं।

अध्याय ७: भगवान शिव का हस्तक्षेप और शांति की वापसी

सहस्त्र रावण के वध के बाद भी महाकाली का क्रोध शांत नहीं हुआ। वे रणभूमि में तांडव करने लगीं। उनके तांडव से पूरी पृथ्वी डगमगाने लगी और सृष्टि के नष्ट होने का खतरा पैदा हो गया। तब देवताओं की प्रार्थना पर स्वयं भगवान शिव वहां प्रकट हुए और महाकाली के मार्ग में जमीन पर लेट गए। जैसे ही महाकाली का पैर भगवान शिव की छाती पर पड़ा, वे रुक गईं। अपने आराध्य को पैरों के नीचे देखकर उनका क्रोध शांत हुआ। उन्होंने अपनी जीभ दांतों तले दबा ली और पुनः अपने सौम्य 'सीता' रूप में लौट आईं। तब तक श्रीराम भी चेतना में आ चुके थे और ब्रह्मांड एक बार फिर सुरक्षित हो गया था।