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रामायण का सबसे खौफनाक रहस्य: जब पाताल में दी जाने वाली थी श्रीराम और लक्ष्मण की बलि

अहिरावण और हनुमान जी की कथा: पाताल विजय
Ahiravana And Hanuman

संपादकीय

जय श्री राम मेरे सभी साथियों, आपका अपना दोस्त आदित्य पोरवाल एक और दिलचस्प कथा के साथ यहाँ मौजूद है। मेरा यह मानना है कि हमारी हर पुरानी कहानी एक ऐसा आईना है, जिसमें हम अपना आज और कल दोनों देख सकते हैं। जब भी हम इन रहस्यमयी घटनाओं के बारे में पढ़ते हैं, तो हमें यह एहसास होता है कि परमात्मा ने हमारे लिए कितनी अद्भुत व्यवस्था की है। आज की यह कहानी आपको उसी ईश्वरीय कृपा का एक नया अनुभव कराएगी। आइए, बिना किसी देरी के इस प्राचीन रहस्य को उजागर करते हैं।

रावण की हताशा और पाताल के जादूगर का बुलावा

लंका के महायुद्ध में जब रावण के बड़े-बड़े योद्धा और उसके पुत्र मेघनाद और कुंभकर्ण मारे गए, तो रावण बुरी तरह घबरा गया। अपनी निश्चित हार को देखते हुए उसने एक भयंकर मायावी चाल चली। उसने पाताल लोक के राजा और अपने चचेरे भाई 'अहिरावण' (जिसे कुछ ग्रंथों में महिरावण भी कहा जाता है) का आवाहन किया। अहिरावण कोई साधारण राक्षस नहीं था; वह काले जादू, तंत्र-मंत्र और मायावी विद्याओं का सबसे बड़ा तांत्रिक था। रावण ने उसे आदेश दिया कि वह राम और लक्ष्मण का अपहरण कर ले।

विभीषण की खौफनाक चेतावनी और हनुमान जी का चक्रव्यूह

जब विभीषण को अपने गुप्तचरों से भनक लगी कि अहिरावण लंका आ चुका है, तो उनके होश उड़ गए। उन्होंने तुरंत सुग्रीव और हनुमान जी को सावधान किया, "अहिरावण बहुत बड़ा मायावी है। वह आज रात ही राम और लक्ष्मण का अपहरण करने की कोशिश करेगा।" यह सुनकर राम दल में हड़कंप मच गया। भगवान राम और लक्ष्मण की सुरक्षा के लिए हनुमान जी ने अपनी पूंछ को बढ़ाकर एक अभेद्य किले (चक्रव्यूह) का रूप दे दिया। उस किले के अंदर राम-लक्ष्मण सो रहे थे और द्वार पर साक्षात् काल बनकर हनुमान जी पहरा दे रहे थे।

विभीषण का भेष और वो खौफनाक अपहरण

आधी रात का समय था। अहिरावण ने अपनी माया से कई रूप धरे—कभी सुग्रीव, कभी जाम्बवंत—लेकिन हनुमान जी ने उसे द्वार पर ही रोक दिया। अंत में उस तांत्रिक ने एक ऐसी चाल चली जिसे कोई पकड़ नहीं सका। उसने स्वयं 'विभीषण' का भेष धारण कर लिया। विभीषण को आता देख हनुमान जी ने उसे अंदर जाने दिया, क्योंकि विभीषण राम के परम भक्त थे। अंदर जाकर अहिरावण ने अपनी तांत्रिक विद्या से एक ऐसी जादुई धूल उड़ाई जिससे राम और लक्ष्मण गहरी मूर्छा (नींद) में चले गए। इसके बाद वह उन दोनों को उठाकर सीधा पाताल लोक ले गया।

पाताल लोक की ओर हनुमान की खतरनाक उड़ान

कुछ देर बाद जब असली विभीषण वहाँ पहुँचे, तो राम और लक्ष्मण को गायब देखकर सब सन्न रह गए। विभीषण समझ गए कि यह अहिरावण का काम है। उन्होंने हनुमान जी को बताया कि अहिरावण उन दोनों की बलि पाताल की देवी भद्रकाली को चढ़ाने वाला है। समय बहुत कम था। अपने प्रभु की जान खतरे में देख, बजरंगबली ने पाताल लोक की ओर एक अत्यंत खतरनाक और तेज उड़ान भरी। रास्ते में उन्हें कई मायावी राक्षसों और जादुई बाधाओं का सामना करना पड़ा।

मकरध्वज से महासंग्राम और वो अनसुलझा सत्य

पाताल लोक के द्वार पर पहुँचते ही हनुमान जी को एक विचित्र और अत्यंत बलवान वानर ने रोक लिया। वह वानर देखने में बिल्कुल हनुमान जी जैसा था। दोनों के बीच एक भयंकर युद्ध छिड़ गया। जब हनुमान जी ने उससे उसका परिचय पूछा, तो उसने कहा, "मैं मकरध्वज हूँ, और मेरे पिता का नाम हनुमान है।" यह सुनकर हनुमान जी हैरान रह गए, क्योंकि वे तो बाल ब्रह्मचारी थे! मकरध्वज ने बताया कि लंका दहन के बाद जब हनुमान जी ने समुद्र में अपनी पूंछ की आग बुझाई थी, तब उनके पसीने की एक बूंद एक मछली (मकर) ने निगल ली थी, जिससे उसका जन्म हुआ। सत्य जानकर हनुमान जी ने उसे गले लगाया और उसे बांधकर पाताल के अंदर प्रवेश किया।

भद्रकाली का मंदिर और बलि की वो भयानक रात

पाताल लोक के एक विशाल गुफा नुमा मंदिर में महामाया भद्रकाली की मूर्ति स्थापित थी। वहां तंत्र-मंत्र की भयानक ध्वनियां गूंज रही थीं। श्रीराम और लक्ष्मण को मूर्छित अवस्था में बलि वेदी पर लिटाया गया था। अहिरावण हाथ में एक विशाल खड्ग (तलवार) लिए उनकी बलि देने ही वाला था कि अचानक एक भयंकर गर्जना हुई। हनुमान जी ने मंदिर में प्रवेश किया। अहिरावण की माया ऐसी थी कि वह पल-पल में रूप बदल रहा था और उसे मारना लगभग असंभव था।

पंचमुखी हनुमान का अवतार और पाताल विजय

मकरध्वज ने हनुमान जी को अहिरावण की मृत्यु का रहस्य बताया था। पाताल लोक में पांच अलग-अलग दिशाओं में पांच जादुई दीपक जल रहे थे। अहिरावण के प्राण उन्हीं पांच दीपकों में बसते थे। जब तक वे पांचों दीपक एक साथ नहीं बुझाए जाते, अहिरावण को कोई नहीं मार सकता था। तब हनुमान जी ने अपना सबसे उग्र और दिव्य स्वरूप धारण किया—'पंचमुखी हनुमान' (वानर, नरसिंह, गरुड़, वराह, और हयग्रीव)। उन्होंने एक साथ पांचों दिशाओं में फूंक मारकर उन जादुई दीपकों को बुझा दिया। दीपक बुझते ही अहिरावण की माया टूट गई और हनुमान जी ने उसका वध कर दिया। श्रीराम और लक्ष्मण को सुरक्षित लेकर वे वापस लौट आए।

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आदित्य पोरवाल
— श्री आदित्य पोरवाल, संपादक

"मैं इस साइट के माध्यम से सनातन ज्ञान की अनमोल कहानियों, विधि सामग्री, राशिफल और पंचांग को आप तक पहुँचाने का प्रयास कर रहा हूँ। मैं यह चाहता हूँ कि आप उन सभी को हमारी कहानियाँ शेयर करें जो जीवन की दौड़ में अपनी जड़ों से दूर हो गए हैं, या जिन्हें चिंता है कि हमारे बच्चे अपनी संस्कृति कैसे सीखेंगे। मेरा उद्देश्य है कि इन कहानियों के माध्यम से धीरे-धीरे समस्त दुनिया में हमारे सनातनी अपनी जड़ों से जुड़ सकें।"