रामायण का सबसे बड़ा धर्मसंकट: जब रणभूमि में आमने-सामने आ गए भगवान राम और हनुमान
अध्याय १: महर्षि विश्वामित्र का क्रोध और एक खौफनाक प्रतिज्ञा
रामराज्य की स्थापना के बाद अयोध्या में शांति थी, लेकिन एक दिन काशी के राजा ययाति से अनजाने में एक भयंकर भूल हो गई। उन्होंने राजदरबार में महर्षि विश्वामित्र का अभिवादन नहीं किया। इस अपमान से विश्वामित्र का क्रोध सातवें आसमान पर पहुँच गया। उन्होंने उसी क्षण भगवान राम को आदेश दिया कि सूर्यास्त से पहले राजा ययाति का वध कर दिया जाए। अपने गुरु के आदेश से बंधे श्रीराम ने भारी मन से यह प्रतिज्ञा ले ली कि आज शाम से पहले वे ययाति का सिर धड़ से अलग कर देंगे।
अध्याय २: मृत्यु के भय से भागता राजा और माता अंजनी की शरण
जब राजा ययाति को पता चला कि साक्षात् भगवान राम उनके प्राण लेने आ रहे हैं, तो उनकी रूह कांप उठी। वह अपनी जान बचाने के लिए तीनों लोकों में भटके, लेकिन श्रीराम के डर से किसी ने उन्हें शरण नहीं दी। अंत में महर्षि नारद के भेष में एक देव ने ययाति को सलाह दी कि वह माता अंजनी (हनुमान जी की माता) की शरण में जाए। ययाति रोते हुए माता अंजनी के चरणों में गिर पड़े। माता अंजनी ने करुणा में आकर ययाति को अभय दान दे दिया, लेकिन ययाति ने यह नहीं बताया कि उन्हें मारने वाला कौन है।
अध्याय ३: महाबली हनुमान का सबसे बड़ा धर्मसंकट
कुछ ही देर बाद जब हनुमान जी वहां पहुंचे, तो माता अंजनी ने उन्हें आदेश दिया कि वह राजा ययाति के प्राणों की रक्षा करें। हनुमान जी ने अपनी माता को वचन दे दिया। लेकिन जब उन्होंने ययाति से उनके शत्रु का नाम पूछा, तो ययाति के मुंह से 'श्रीराम' का नाम सुनकर हनुमान जी के पैरों तले ज़मीन खिसक गई। एक तरफ उनके आराध्य भगवान राम थे, और दूसरी तरफ माता को दिया गया अटूट वचन। हनुमान जी समझ गए कि अब उनका सामना साक्षात् काल से होने वाला है।
अध्याय ४: रणभूमि में वो अभूतपूर्व और भयावह दृश्य
दोपहर ढल रही थी। सरयू नदी के तट पर श्रीराम अपनी पूरी सेना के साथ राजा ययाति का वध करने पहुँचे। लेकिन सामने का दृश्य देखकर श्रीराम और पूरी अयोध्या सेना सन्न रह गई। राजा ययाति के आगे एक विशाल चट्टान की तरह महाबली हनुमान खड़े थे। उनके हाथों में कोई अस्त्र-शस्त्र नहीं था। उनकी आँखें बंद थीं और वे गहरी समाधि में लीन होकर अपने प्रभु का इंतज़ार कर रहे थे। एक भक्त अपने भगवान के प्रहार झेलने के लिए तैयार था।
अध्याय ५: अचूक बाणों की वर्षा और 'राम-नाम' की अभेद्य ढाल
श्रीराम ने हनुमान से ययाति को सौंपने को कहा, लेकिन हनुमान जी ने विनम्रता से अपनी माता के वचन की दुहाई दी और हटने से इंकार कर दिया। विवश होकर श्रीराम ने अपना धनुष उठाया और हनुमान जी पर अपने अचूक और विनाशकारी बाणों की वर्षा शुरू कर दी। लेकिन यहाँ एक अद्भुत चमत्कार हो रहा था। हनुमान जी ने कोई हथियार नहीं उठाया, वे केवल आँखें बंद करके "श्री राम, जय राम, जय जय राम" का अखंड जाप कर रहे थे। राम का नाम ही उनकी ढाल बन गया। श्रीराम के तीखे बाण हनुमान जी के शरीर को छूते ही कोमल फूलों में बदल जाते और उनके चरणों में गिर जाते।
अध्याय ६: ब्रह्मास्त्र का संधान और ब्रह्मांड में हाहाकार
सूर्यास्त का समय करीब आ रहा था। गुरु की प्रतिज्ञा पूरी न होते देख श्रीराम को अंततः अपना सबसे विनाशकारी अस्त्र—'ब्रह्मास्त्र'—निकालना पड़ा। ब्रह्मास्त्र के प्रकट होते ही तीनों लोकों में हाहाकार मच गया। देवताओं की सांसें अटक गईं। श्रीराम ने कांपते हाथों से ब्रह्मास्त्र हनुमान जी की छाती की ओर छोड़ दिया। लेकिन राम-नाम के महामंत्र में इतनी शक्ति थी कि ब्रह्मांड को भस्म करने वाला वह अस्त्र भी हनुमान जी के चारों ओर परिक्रमा करने लगा और बिना उन्हें नुकसान पहुँचाए वापस लौट गया।
अध्याय ७: गुरु का हृदय परिवर्तन और भक्ति की परम विजय
यह दृश्य देखकर स्वर्ग से देवता भी फूल बरसाने लगे। महर्षि विश्वामित्र समझ गए कि दुनिया में अस्त्रों और अहंकार से भी बड़ी कोई चीज़ है, तो वह है—सच्ची भक्ति और राम-नाम की शक्ति। गुरु विश्वामित्र का अहंकार आंसुओं में बह गया। वे दौड़कर रणभूमि में आए और उन्होंने श्रीराम को अपनी खौफनाक प्रतिज्ञा से मुक्त कर दिया। उन्होंने हनुमान जी को गले लगा लिया और कहा, "हे महावीर! तुमने सिद्ध कर दिया कि राम से भी बड़ा राम का नाम है।" इस प्रकार बिना कोई अस्त्र उठाए, हनुमान जी ने यह महासंग्राम जीत लिया।