महाभारत का सबसे बड़ा रहस्य: वो अजेय योद्धा जिसके तीन बाणों से स्वयं श्रीकृष्ण भी घबरा गए थे
अध्याय १: घटोत्कच का महाबली पुत्र
कुरुक्षेत्र के मैदान में जहाँ एक से बढ़कर एक महारथी मौजूद थे, वहीं एक ऐसा योद्धा भी था जो इस युद्ध का पूरा परिणाम अकेले ही बदल सकता था। उसका नाम था—बर्बरीक। बर्बरीक, महाबली भीम के पुत्र घटोत्कच का बेटा था। बचपन से ही बर्बरीक अत्यंत बलवान और मायावी विद्याओं का ज्ञाता था। उसने भगवान शिव और माता दुर्गा की घोर तपस्या की थी, जिससे उसे एक ऐसा वरदान मिला था जो उसे पूरे ब्रह्मांड में अजेय बनाता था।
अध्याय २: तीन बाणों का वो खौफनाक वरदान
भगवान शिव ने बर्बरीक की तपस्या से प्रसन्न होकर उसे तीन अचूक और दिव्य बाण (तीर) दिए थे। ये कोई साधारण बाण नहीं थे। बर्बरीक का पहला बाण उन सभी लक्ष्यों पर निशान लगा देता था जिन्हें वह नष्ट करना चाहता था। दूसरा बाण उन सभी चीजों पर निशान लगाता था जिन्हें वह सुरक्षित रखना चाहता था। और तीसरा बाण पलक झपकते ही उन सभी लक्ष्यों को भेदकर नष्ट कर देता था जिन पर पहले बाण ने निशान लगाया था। इन तीन बाणों के साथ बर्बरीक किसी भी विशाल सेना को मिनटों में भस्म कर सकता था।
अध्याय ३: माता को दिया वो आत्मघाती वचन
जब महाभारत का युद्ध तय हो गया, तो बर्बरीक ने भी अपनी माता से युद्ध में जाने की आज्ञा मांगी। उसकी माता जानती थीं कि बर्बरीक के पास जो शक्तियाँ हैं, वे विनाशकारी हैं। इसलिए उन्होंने बर्बरीक से एक ऐसा वचन लिया जिसने पूरे युद्ध का समीकरण ही बदल दिया। माता ने कहा, "पुत्र, तुम युद्ध में उसी पक्ष की ओर से लड़ोगे, जो पक्ष हार रहा होगा।" बर्बरीक ने अपनी माता को यह वचन दे दिया और अपने नीले घोड़े पर सवार होकर, अपने तीन बाण लेकर कुरुक्षेत्र की ओर निकल पड़ा। उसे 'हारे का सहारा' कहा जाने लगा।
अध्याय ४: श्रीकृष्ण की चिंता और ब्राह्मण वेश में परीक्षा
भगवान श्रीकृष्ण अंतर्यामी थे। जब उन्हें पता चला कि बर्बरीक 'हारे का सहारा' बनकर आ रहा है, तो वे गहरी चिंता में पड़ गए। वे जानते थे कि युद्ध में कौरवों का हारना तय है। जैसे ही कौरव हारने लगेंगे, बर्बरीक अपने वचन के अनुसार कौरवों की तरफ से लड़ने लगेगा। और अगर बर्बरीक ने अपने तीन बाण चला दिए, तो पांडवों का सर्वनाश निश्चित था। इस महाविनाश को रोकने के लिए, श्रीकृष्ण ने एक साधारण ब्राह्मण का भेष धारण किया और बर्बरीक के रास्ते में जा खड़े हुए।
अध्याय ५: पीपल के पत्तों का वो अचूक निशाना
ब्राह्मण रूपी श्रीकृष्ण ने बर्बरीक को रोककर उसकी शक्तियों का उपहास उड़ाया और कहा, "केवल तीन बाणों से तुम महाभारत का युद्ध कैसे लड़ोगे?" बर्बरीक ने मुस्कुराकर कहा कि उसका एक ही बाण पूरी सेना को खत्म करने के लिए काफी है। श्रीकृष्ण ने उसे चुनौती दी कि वह सामने खड़े पीपल के पेड़ के सभी पत्तों को एक ही बाण से छेद कर दिखाए। बर्बरीक ने अपना पहला बाण निकाला। बाण ने पल भर में पेड़ के सभी पत्तों पर निशान लगा दिया। लेकिन श्रीकृष्ण ने चुपके से एक पत्ता अपने पैर के नीचे छिपा लिया था। वह दिव्य बाण श्रीकृष्ण के पैर के पास आकर मंडराने लगा। बर्बरीक समझ गया और बोला, "हे ब्राह्मण देव! अपना पैर हटा लीजिए, अन्यथा यह बाण आपके पैर को भेद देगा।" श्रीकृष्ण को यकीन हो गया कि बर्बरीक अजेय है।
अध्याय ६: इतिहास का सबसे भयानक दान (शीश दान)
श्रीकृष्ण जान गए थे कि धर्म की रक्षा के लिए बर्बरीक को इस युद्ध से रोकना ही होगा। उन्होंने ब्राह्मण रूप में बर्बरीक से दान मांगा। बर्बरीक, जो एक सच्चा क्षत्रिय था, उसने कहा, "मांगिए ब्राह्मण देव, आप जो मांगेंगे मैं दूंगा।" तब श्रीकृष्ण ने उसका शीश (सिर) मांग लिया। यह सुनकर बर्बरीक सन्न रह गया। वह समझ गया कि कोई साधारण ब्राह्मण ऐसा दान नहीं मांग सकता। उसने श्रीकृष्ण से अपने वास्तविक रूप में आने की विनती की। श्रीकृष्ण ने उसे अपने विराट स्वरूप के दर्शन दिए।
अध्याय ७: पहाड़ी पर रखा कटा सिर और कलियुग का भगवान
बर्बरीक ने हँसते हुए अपना सिर धड़ से अलग कर श्रीकृष्ण को सौंप दिया। लेकिन उसने एक अंतिम इच्छा प्रकट की कि वह यह पूरा युद्ध अपनी आँखों से देखना चाहता है। श्रीकृष्ण ने उसके कटे हुए सिर को अमृत से सींचकर कुरुक्षेत्र की एक ऊँची पहाड़ी पर रख दिया, जहाँ से बर्बरीक ने 18 दिनों का पूरा महाभारत युद्ध देखा। युद्ध के बाद श्रीकृष्ण ने बर्बरीक के इस महान बलिदान से प्रसन्न होकर उसे वरदान दिया कि कलियुग में वह श्रीकृष्ण के ही नाम 'श्याम' से पूजा जाएगा। आज उसी बर्बरीक को पूरी दुनिया 'खाटू श्याम' के नाम से पूजती है, जो आज भी 'हारे का सहारा' हैं।