संजीवनी बूटी: जब लक्ष्मण के प्राण बचाने के लिए हनुमान जी ने उठा लिया था पूरा द्रोणागिरि पर्वत
संपादकीय
राधे-राधे दोस्तों, मैं आपका साथी आदित्य पोरवाल आज एक बार फिर इस मंच पर आपका हृदय से स्वागत करता हूँ। कालचक्र घूमता रहता है, युग बदल जाते हैं, परंतु मानवीय मन की उलझनें आज भी वैसी ही हैं जैसी सदियों पूर्व थीं। जब भी मेरा मन अशांत होता है, तो मैं इन्हीं प्राचीन कथाओं की शरण में जाता हूँ, और हर बार मुझे एक नया समाधान मिलता है। आज की कहानी भी हमारी इसी आध्यात्मिक यात्रा का एक बहुत ही सुंदर हिस्सा है। तो आइए मेरे प्रियजनों, आज की इस पावन कथा के सागर में एक साथ गोता लगाते हैं।
मेघनाद का घातक प्रहार और लक्ष्मण की मूर्छा
रावण के पुत्र मेघनाद और लक्ष्मण के बीच भयंकर युद्ध चल रहा था। मेघनाद ने अपनी मायावी शक्तियों का प्रयोग करते हुए लक्ष्मण पर 'शक्ति बाण' (वीरघातिनी शक्ति) का प्रहार कर दिया। बाण लगते ही लक्ष्मण मूर्छित होकर गिर पड़े। राम की सेना में हाहाकार मच गया और स्वयं भगवान राम अपने भाई की यह दशा देखकर गहरे शोक में डूब गए।
वैद्य सुषेण का आना और संजीवनी का उपाय
विभीषण की सलाह पर लंका के राजवैद्य सुषेण को बुलवाया गया। सुषेण ने लक्ष्मण की नब्ज़ जांची और बताया कि भोर होने से पहले अगर हिमालय के द्रोणागिरि पर्वत से 'संजीवनी बूटी' लाई जाए, तभी लक्ष्मण के प्राण बच सकते हैं। यदि सूर्योदय हो गया, तो लक्ष्मण को बचाना असंभव हो जाएगा।
हनुमान जी की हिमालय उड़ान और कालनेमि का छल
यह सुनकर संकटमोचन हनुमान जी ने संजीवनी बूटी लाने का बीड़ा उठाया और वायु वेग से हिमालय की ओर उड़ चले। रावण को जब यह पता चला, तो उसने हनुमान जी को रोकने के लिए कालनेमि नामक मायावी राक्षस को भेजा। कालनेमि ने एक साधु का वेश धरकर हनुमान जी को मार्ग में रोक लिया, लेकिन हनुमान जी ने उसके छल को पहचान कर उसका वध कर दिया।
द्रोणागिरि पर्वत पर संजीवनी की खोज
कालनेमि का वध करने के बाद हनुमान जी द्रोणागिरि पर्वत पर पहुंचे। वहां पहुंचकर उन्होंने देखा कि पूरा पर्वत चमचमाती हुई जड़ी-बूटियों से भरा पड़ा था। वैद्य सुषेण ने जिस संजीवनी बूटी की पहचान बताई थी, हनुमान जी उसे इतने सारे चमत्कारी पौधों के बीच पहचान नहीं पा रहे थे। समय बहुत कम था और भोर होने वाली थी।
पूरा पर्वत ही उठा लाए संकटमोचन
जब हनुमान जी को कुछ समझ नहीं आया कि कौन सी बूटी संजीवनी है, तो उन्होंने अपनी अपार शक्ति का प्रदर्शन किया। उन्होंने सोचा कि यदि वे गलत बूटी ले गए तो लक्ष्मण के प्राण संकट में पड़ जाएंगे, इसलिए उन्होंने अपने विशाल हाथों से पूरे द्रोणागिरि पर्वत को ही जड़ से उखाड़ लिया और उसे अपनी हथेली पर रखकर लंका की ओर उड़ चले।
भरत का बाण और हनुमान जी की अयोध्या में परीक्षा
मार्ग में हनुमान जी अयोध्या के ऊपर से गुजरे। वहां भरत रात में पहरा दे रहे थे। उन्होंने एक विशाल वानर को पर्वत ले जाते देखा तो राक्षस समझकर बिना फल का एक बाण मार दिया। राम का नाम लेते हुए हनुमान जी नीचे गिरे। सारी बात जानकर भरत को बहुत पश्चाताप हुआ। उन्होंने हनुमान जी को अपने बाण पर बिठाकर लंका भेजने का प्रस्ताव दिया, लेकिन हनुमान जी अपनी शक्ति से तुरंत लंका के लिए निकल पड़े।
संजीवनी का प्रभाव और लक्ष्मण का पुनर्जन्म
सूर्योदय से ठीक पहले हनुमान जी पर्वत लेकर लंका पहुंच गए। वैद्य सुषेण ने तुरंत संजीवनी बूटी पहचानी और उसे पीसकर लक्ष्मण को पिलाई। बूटी का अर्क गले से नीचे उतरते ही लक्ष्मण की मूर्छा टूट गई और वे उठ खड़े हुए। भगवान राम ने अपने भाई को गले लगा लिया और हनुमान जी को अश्रुपूर्ण नेत्रों से धन्यवाद दिया, क्योंकि उन्होंने एक बार फिर असंभव को संभव कर दिखाया था।
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