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आत्मा का रहस्य और शरीर का भ्रम: जब 12 साल के बालक ने राजा जनक को दिखाया सत्य का आईना

 


​अध्याय १: आठ अंगों से टेढ़ा शरीर और एक क्रोधी पिता का श्राप

​प्राचीन काल में महर्षि कहोड़ एक महान विद्वान थे। उनकी पत्नी सुजाता गर्भवती थीं। गर्भ में पल रहा शिशु इतना ज्ञानी था कि वह अपनी माता के गर्भ से ही पिता द्वारा पढ़े जा रहे वेदों को सुनता और समझता था। एक दिन जब महर्षि कहोड़ वेद पाठ कर रहे थे, तो गर्भ से शिशु ने कहा, "पिताश्री! आप मंत्रों का उच्चारण गलत कर रहे हैं।" अपने ही अजन्मे पुत्र से यह टोक सुनकर महर्षि कहोड़ का अहंकार आहत हो गया। क्रोध में आकर उन्होंने श्राप दिया, "तूने गर्भ से ही मुझे टेढ़ा (गलत) साबित किया है, जा तेरा शरीर आठ जगहों से टेढ़ा-मेढ़ा हो जाएगा!" इसी श्राप के कारण उस बालक का जन्म आठ अंगों से विकलांग रूप में हुआ, और उसका नाम पड़ा—'अष्टावक्र'।

​अध्याय २: बंदी से हार और पिता का जल-समाधि दंड

​अष्टावक्र अभी छोटे ही थे कि उनके पिता महर्षि कहोड़ को धन की आवश्यकता हुई। वे मिथिला के राजा जनक के दरबार में गए, जहाँ 'बंदी' (या वंदी) नामक एक अजेय और मायावी विद्वान रहता था। बंदी से शास्त्रार्थ (Debate) में जो भी हारता, उसे जल में डुबो दिया जाता था। महर्षि कहोड़ बंदी से हार गए और उन्हें जल-समाधि दे दी गई। जब अष्टावक्र 12 वर्ष के हुए, तो उन्हें अपनी माता से इस दुखद घटना का पता चला। अपने पिता को मुक्त कराने के लिए, 12 साल का वह बालक अपनी टेढ़ी-मेढ़ी चाल से मिथिला की ओर निकल पड़ा।

​अध्याय ३: राजा जनक का दरबार और वो अपमानजनक हँसी

​राजा जनक की राजसभा पूरे आर्यावर्त में ज्ञानियों की सबसे बड़ी सभा मानी जाती थी। जब 12 वर्षीय अष्टावक्र अपने आठ जगहों से मुड़े हुए, अजीबोगरीब शरीर के साथ राजसभा में लड़खड़ाते हुए पहुँचे, तो उन्हें देखकर पूरी राजसभा सन्न रह गई। फिर अचानक, वहाँ बैठे सभी बड़े-बड़े ज्ञानी, ऋषि और मंत्री उस बालक के शारीरिक रूप को देखकर ज़ोर-ज़ोर से ठहाके लगाकर हँसने लगे। स्वयं राजा जनक भी अपनी मुस्कान नहीं रोक पाए।

​अध्याय ४: "यह ज्ञानियों की सभा नहीं, चर्मकारों की मंडी है!"

​पूरी सभा को हँसता देख, अष्टावक्र अचानक उन सबसे भी कई गुना ज़ोर से हँसने लगे। बालक की यह भयंकर हँसी सुनकर राजसभा में सन्नाटा छा गया। राजा जनक ने आश्चर्य से पूछा, "हे बालक! हमारे हँसने का कारण तो तुम्हारा यह विचित्र शरीर है, परंतु तुम क्यों हँसे?"

अष्टावक्र ने कड़कती हुई आवाज़ में ऐसा जवाब दिया जिसने पूरे दरबार को हिलाकर रख दिया। उन्होंने कहा, "राजन्! मैं इसलिए हँसा क्योंकि मुझे लगा था कि मैं ज्ञानियों की सभा में आया हूँ, लेकिन यहाँ तो चमड़े के व्यापारी (चर्मकार/मोची) बैठे हैं! जैसे एक चर्मकार केवल चमड़े (शरीर) की गुणवत्ता देखता है, वैसे ही ये सब भी केवल मेरा मांस और चमड़ा देख रहे हैं, मेरे भीतर बैठी उस अनंत और शुद्ध आत्मा को नहीं।"

​अध्याय ५: राजा जनक का अहंकार टूटना और समर्पण

​अष्टावक्र के इन शब्दों ने राजा जनक के मन पर बिजली सा प्रहार किया। उन्हें एहसास हुआ कि ज्ञान का अहंकार सबसे बड़ा अज्ञान है। राजा जनक तुरंत अपने सिंहासन से उतरे और 12 वर्ष के उस विकलांग बालक के चरणों में गिर पड़े। उन्होंने पूरी सभा के सामने अष्टावक्र से क्षमा मांगी और उन्हें अपना गुरु मानकर एक ऊँचे सिंहासन पर बैठाया। जनक ने हाथ जोड़कर पूछा, "हे प्रभु! ज्ञान कैसे प्राप्त होता है? मुक्ति कैसे मिलती है? और वैराग्य क्या है?"

​अध्याय ६: अष्टावक्र गीता का जन्म (महान संवाद)

​यहीं से गुरु अष्टावक्र और शिष्य राजा जनक के बीच उस महान संवाद की शुरुआत हुई जिसे दुनिया आज 'अष्टावक्र गीता' के नाम से जानती है।

अष्टावक्र ने कहा: "हे राजन्! यदि तुम मुक्ति चाहते हो, तो विषयों (इच्छाओं) को विष (ज़हर) की तरह त्याग दो, और क्षमा, दया, संतोष, और सत्य को अमृत की तरह पी लो। तुम न तो यह शरीर हो, न पृथ्वी, न जल, न अग्नि, न वायु और न ही आकाश। तुम इन सबसे अलग, इन सबको देखने वाले 'शुद्ध चैतन्य' (चेतना) हो। जिस दिन तुम खुद को शरीर मानना छोड़ दोगे और खुद को 'आत्मा' जान लोगे, उसी क्षण तुम मुक्त हो जाओगे।" राजा जनक को उसी क्षण आत्मज्ञान की प्राप्ति हो गई।

​अध्याय ७: पिता की मुक्ति और आत्मा की विजय

​ज्ञान का यह अमृत बांटने के बाद, अष्टावक्र ने उस मायावी विद्वान 'बंदी' को शास्त्रार्थ के लिए चुनौती दी। बंदी बहुत ज्ञानी था, लेकिन अष्टावक्र के आत्मज्ञान के आगे उसकी एक न चली। 12 साल के उस बालक ने अपने तर्कों से बंदी को बुरी तरह हरा दिया। हारने के बाद बंदी ने महर्षि कहोड़ (अष्टावक्र के पिता) और अन्य सभी हारे हुए ऋषियों को जल से मुक्त कर दिया। महर्षि कहोड़ अपने पुत्र का यह ज्ञान और प्रताप देखकर रो पड़े और उन्हें गले लगा लिया। अष्टावक्र ने सिद्ध कर दिया कि शरीर चाहे कितना भी अपूर्ण क्यों न हो, आत्मा हमेशा पूर्ण, शुद्ध और सुंदर होती है।