श्री कृष्ण और सुदामा की मित्रता: सच्ची दोस्ती और प्रेम की अनमोल कथा
अध्याय १: संदीपन ऋषि का आश्रम और अटूट मित्रता द्वापर युग की बात है, जब भगवान श्री कृष्ण और सुदामा सांदीपन ऋषि के आश्रम में एक साथ शिक्षा ग्रहण कर रहे थे। कृष्ण एक राजघराने से थे और सुदामा एक अत्यंत निर्धन ब्राह्मण परिवार से, लेकिन उनके बीच की मित्रता में कोई ऊंच-नीच नहीं थी। वे साथ में जंगल से लकड़ियाँ चुनते, साथ भोजन करते और शास्त्रों का ज्ञान प्राप्त करते। आश्रम की शिक्षा पूरी होने के बाद दोनों अपने-अपने रास्तों पर निकल गए, पर उनकी मित्रता अमर रही।
अध्याय २: सुदामा की घोर दरिद्रता और पत्नी का आग्रह समय बीता और श्री कृष्ण द्वारका के राजा बन गए। दूसरी ओर, सुदामा अपनी पत्नी सुशीला और बच्चों के साथ एक टूटी-फूटी कुटिया में रहते थे। सुदामा इतने निर्धन थे कि कई बार परिवार को कई दिनों तक भूखा रहना पड़ता था। उनकी पत्नी सुशीला ने एक दिन अत्यंत विनम्रता से कहा, "स्वामी, आप कहते हैं कि द्वारकाधीश श्री कृष्ण आपके मित्र हैं। वे तो दीनदयाल हैं, आप एक बार उनसे मिलने क्यों नहीं जाते? वे आपकी सहायता अवश्य करेंगे।"
अध्याय ३: द्वारका की यात्रा और पोटली का उपहार सुदामा अपने मित्र से कुछ मांगना नहीं चाहते थे, लेकिन पत्नी के बार-बार आग्रह करने पर वे जाने को तैयार हो गए। उपहार स्वरूप देने के लिए उनके घर में कुछ नहीं था, इसलिए सुशीला ने पड़ोस से मांगकर तीन मुट्ठी 'तंदुल' (कच्चे चावल) एक फटे हुए कपड़े में बांधकर दे दिए। फटे हाल में, नंगे पैर सुदामा द्वारका की भव्य नगरी पहुँचे। महल के द्वारपालों ने जब उस निर्धन ब्राह्मण को देखा, तो उन्हें विश्वास ही नहीं हुआ कि यह राजा कृष्ण का मित्र हो सकता है।
अध्याय ४: भगवान कृष्ण का दिव्य स्वागत जैसे ही श्री कृष्ण को पता चला कि उनका मित्र 'सुदामा' द्वार पर खड़ा है, वे नंगे पैर दौड़ते हुए महल के बाहर आए। उन्होंने सुदामा को गले लगा लिया और अपने सिंहासन पर बिठाया। भगवान ने सुदामा के फटे हुए पैरों को अपने आंसुओं से धोया। यह दृश्य देखकर द्वारका के लोग और रानियाँ चकित रह गए कि एक राजा एक गरीब ब्राह्मण की इतनी सेवा कैसे कर सकता है।
अध्याय ५: तीन मुट्ठी चावल और तीन लोक का दान श्री कृष्ण ने सुदामा से पूछा, "मित्र, भाभी ने मेरे लिए क्या भेजा है?" सुदामा लज्जा के मारे पोटली छुपाने लगे, पर कृष्ण ने उसे छीन लिया। जैसे ही कृष्ण ने पहली मुट्ठी चावल खाया, उन्होंने सुदामा को पृथ्वी का राज दे दिया। दूसरी मुट्ठी खाते ही स्वर्ग का वैभव दे दिया। जब वे तीसरी मुट्ठी खाने लगे, तो रुक्मिणी जी ने उनका हाथ पकड़ लिया, क्योंकि वे सब कुछ सुदामा को दान कर चुके थे।
अध्याय ६: बिना मांगे सब कुछ मिल गया सुदामा ने कृष्ण से कुछ नहीं माँगा और वापस अपने गाँव की ओर चल दिए। रास्ते में वे सोच रहे थे कि घर जाकर पत्नी को क्या जवाब देंगे। लेकिन जैसे ही वे अपने गाँव पहुँचे, वहाँ कुटिया की जगह एक भव्य महल खड़ा था। उनकी पत्नी और बच्चे राजसी ठाट-बाट में थे। सुदामा समझ गए कि उनके अंतर्यामी मित्र ने बिना बोले ही उनकी सारी दरिद्रता दूर कर दी है।