श्री मंदिर जी

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गोवर्धन पर्वत की कथा: जब श्री कृष्ण ने तोड़ा देवराज इंद्र का अहंकार

 

संपादकीय

नमस्कार दोस्तों, आपका अपना आदित्य पोरवाल एक बार फिर इस रहस्यमयी यात्रा में आपका स्वागत करता है। कई बार मैं सोचता हूँ कि हमारे प्राचीन ग्रंथों में जीवन की कितनी गहरी सच्चाइयाँ छिपी हैं। हम दैनिक जीवन की भागदौड़ में इतने उलझ जाते हैं कि अपनी जड़ों और उन पुरानी कथाओं के असली अर्थ को भूल जाते हैं। आज की जो कहानी मैं आपके लिए लाया हूँ, वह हमें इसी सत्य से जोड़ेगी और जीवन का एक बड़ा सबक सिखाएगी। तो चलिए मित्रों, आज की इस अद्भुत और ज्ञानवर्धक कथा का आनंद लेते हैं।

ब्रज की परंपरा और इंद्र की पूजा द्वापर युग में गोकुल और ब्रज के वासी हर साल देवराज इंद्र की बड़ी धूमधाम से पूजा करते थे। उनका मानना था कि इंद्र देव ही वर्षा करते हैं, जिससे उनके खेतों में अन्न उगता है और गायों को घास मिलती है। बालक कृष्ण ने जब यह देखा, तो उन्होंने अपने पिता नंद बाबा और ब्रजवासियों से पूछा कि हम इंद्र की पूजा क्यों करते हैं?

कर्म का संदेश और कृष्ण का तर्क श्री कृष्ण ने तर्क दिया कि वर्षा करना तो इंद्र का कर्तव्य है, लेकिन हमें उस गोवर्धन पर्वत की पूजा करनी चाहिए जो वास्तव में हमें चारा, फल और जल प्रदान करता है। कृष्ण ने समझाया कि कर्म ही पूजा है। उनकी बात मानकर सभी ब्रजवासियों ने इंद्र की जगह गोवर्धन पर्वत की पूजा शुरू कर दी।

देवराज इंद्र का भयंकर क्रोध जब इंद्र को पता चला कि ब्रजवासियों ने उनकी पूजा बंद कर दी है, तो वे इसे अपना अपमान समझकर क्रोध से भर गए। उन्होंने ब्रज का विनाश करने के लिए 'संवर्तक' बादलों को आदेश दिया कि वे वहाँ इतनी मूसलाधार वर्षा करें कि पूरा ब्रज जलमग्न हो जाए। देखते ही देखते भयंकर तूफान और बारिश शुरू हो गई।

गोवर्धन पर्वत का धारण घबराए हुए ब्रजवासी श्री कृष्ण के पास पहुँचे। तब भगवान ने अपनी लीला दिखाई और अपनी छोटी उंगली (कनिष्ठा) पर विशाल गोवर्धन पर्वत को उठा लिया। उन्होंने पूरे ब्रज को पर्वत के नीचे शरण दी। सात दिनों और सात रातों तक लगातार मूसलाधार बारिश होती रही, लेकिन भगवान ने पर्वत को एक पल के लिए भी नहीं डिगने दिया।

इंद्र की हार और क्षमा याचना जब इंद्र ने देखा कि उनका सारा बल कृष्ण के सामने विफल हो गया है, तो उन्हें अपनी भूल का अहसास हुआ। वर्षा रुक गई और इंद्र स्वयं स्वर्ग से उतरकर श्री कृष्ण के पास आए। उन्होंने भगवान के चरणों में गिरकर अपने अहंकार के लिए क्षमा मांगी। इंद्र ने स्वीकार किया कि कृष्ण ही चराचर जगत के स्वामी हैं।

गोवर्धन पूजा का महत्व उसी दिन से गोवर्धन पूजा (अन्नकूट) की परंपरा शुरू हुई। यह कथा हमें सिखाती है कि अहंकार का अंत निश्चित है और भगवान हमेशा अपने भक्तों की रक्षा करते हैं। आज भी भक्त गोवर्धन की परिक्रमा करके अपनी श्रद्धा व्यक्त करते हैं।


अगर आप में एक ऐसी सच्चाई बर्दाश्त करने की हिम्मत है जो रातों की नींद उड़ा दे, तो ही आगे बढ़ें। जाने से पहले यह कहानी जरूर पढ़कर जाइए

आदित्य पोरवाल
— श्री आदित्य पोरवाल, संपादक

"मैं इस साइट के माध्यम से सनातन ज्ञान की अनमोल कहानियों, विधि सामग्री, राशिफल और पंचांग को आप तक पहुँचाने का प्रयास कर रहा हूँ। मैं यह चाहता हूँ कि आप उन सभी को हमारी कहानियाँ शेयर करें जो जीवन की दौड़ में अपनी जड़ों से दूर हो गए हैं, या जिन्हें चिंता है कि हमारे बच्चे अपनी संस्कृति कैसे सीखेंगे। मेरा उद्देश्य है कि इन कहानियों के माध्यम से धीरे-धीरे समस्त दुनिया में हमारे सनातनी अपनी जड़ों से जुड़ सकें।"