माता शबरी की अटूट भक्ति और श्री राम के जूठे बेर की संपूर्ण कथा
अध्याय १: शबरी का आरंभिक जीवन और वैराग्य प्राचीन काल में शबरी का नाम श्रमणा था और वह एक भील राजा की पुत्री थी। उसका विवाह एक ऐसे परिवार में तय हुआ था जहाँ परंपरा के नाम पर सैंकड़ों बेकसूर जानवरों की बलि दी जानी थी। जीव-जंतुओं के प्रति दया भाव रखने वाली श्रमणा को यह स्वीकार नहीं था। निर्दोष पशुओं की जान बचाने के लिए वह अपने विवाह से एक रात पहले ही घर छोड़कर वन की ओर निकल पड़ी।
अध्याय २: मतंग ऋषि का आश्रम और गुरु दीक्षा भटकते हुए शबरी मतंग ऋषि के आश्रम पहुँची। ऋषि ने उसकी सेवा भावना और निस्वार्थ प्रेम को देखकर उसे अपने आश्रम में शरण दी। कई वर्षों तक शबरी ने अपने गुरु की सेवा की। जब मतंग ऋषि का अंतिम समय आया, तो उन्होंने शबरी से कहा, "पुत्री, तुम धीरज रखना। इसी आश्रम में एक दिन स्वयं भगवान श्री राम तुमसे मिलने आएंगे।" गुरु के इन वचनों को शबरी ने अपने जीवन का एकमात्र सत्य मान लिया।
अध्याय ३: अटूट प्रतीक्षा और अटूट विश्वास गुरु के जाने के बाद शबरी बूढ़ी हो गई, लेकिन उसका विश्वास कभी कम नहीं हुआ। वह हर रोज आश्रम के रास्ते को साफ करती, फूलों से सजाती और वन से मीठे बेर चुनकर लाती। वह हर बेर को चखकर देखती कि कहीं वह खट्टा तो नहीं है, क्योंकि वह अपने प्रभु को सिर्फ सबसे मीठे बेर ही खिलाना चाहती थी। लोग उसे पागल समझते थे, पर उसे सिर्फ अपने राम का इंतजार था।
अध्याय ४: भगवान श्री राम का आगमन माता सीता की खोज करते हुए भगवान श्री राम और लक्ष्मण मतंग ऋषि के आश्रम पहुँचे। शबरी की वर्षों की तपस्या सफल हुई। जैसे ही उसने अपने आराध्य को देखा, उसके आँखों से अश्रु बहने लगे। उसने प्रभु के चरण पखारे और उन्हें बैठने के लिए आसन दिया। शबरी की ममता और भक्ति को देखकर भगवान राम भावविभोर हो गए।
अध्याय ५: जूठे बेर और प्रेम की पराकाष्ठा शबरी ने बड़े प्रेम से अपने चखे हुए जूठे बेर प्रभु राम के सामने रख दिए। लक्ष्मण जी को लगा कि ये बेर जूठे हैं, लेकिन श्री राम ने मुस्कराते हुए कहा, "लक्ष्मण, इन बेरों में जो स्वाद और प्रेम है, वह मुझे कहीं और नहीं मिला।" प्रभु ने बड़े चाव से उन जूठे बेरों को खाया। उन्होंने दिखाया कि वे ऊंच-नीच या जात-पात नहीं, बल्कि केवल सच्चे प्रेम और भक्ति के भूखे हैं।
अध्याय ६: शबरी का मोक्ष और भक्ति का संदेश श्री राम ने शबरी को 'नवधा भक्ति' का उपदेश दिया और उसे आशीर्वाद दिया। शबरी ने प्रभु के दर्शन पाकर अपना देह त्याग दिया और उसे सायुज्य मुक्ति प्राप्त हुई। शबरी की यह कथा आज भी हमें सिखाती है कि यदि भक्ति में धैर्य और विश्वास हो, तो ईश्वर स्वयं भक्त के द्वार तक चलकर आते हैं।
