श्री मंदिर जी

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Shri Hanuman Mandir par aaj: हनुमान जी की लीला अपरंपार है

राम भक्त हनुमान की वीरता और लक्ष्मण प्राण रक्षा की अलौकिक गाथा

 

पहला अध्याय: रणभूमि में संकट के बादल

लंका के मैदान में श्रीराम और रावण की सेनाओं के बीच भयंकर युद्ध चल रहा था। रावण का पुत्र मेघनाद अत्यंत मायावी और शक्तिशाली योद्धा था। उसने अपनी आसुरी शक्तियों का प्रयोग करते हुए युद्ध भूमि में हाहाकार मचा दिया था। मेघनाद ने एक ऐसी शक्ति का संधान किया जो अमोघ थी और सीधे लक्ष्मण जी को जाकर लगी। उस दिव्य अस्त्र के प्रहार से लक्ष्मण जी मूर्छित होकर भूमि पर गिर पड़े। जैसे ही लक्ष्मण जी अचेत हुए वानर सेना में शोक की लहर दौड़ गई। भगवान श्री राम अपने छोटे भाई की यह दशा देख अत्यंत विलाप करने लगे। उनकी आँखों से अश्रुओं की धारा बहने लगी और उन्होंने यहाँ तक कह दिया कि लक्ष्मण के बिना वे अयोध्या वापस नहीं जाएंगे। पूरी वानर सेना और विभीषण इस संकट को देख चिंतित हो उठे क्योंकि लक्ष्मण जी की सांसें बहुत धीमी चल रही थीं और सूर्योदय से पहले उनका उपचार होना अनिवार्य था अन्यथा उनके प्राणों को बचाना असंभव था।

दूसरा अध्याय: विभीषण की सलाह और सुषेण वैद्य

जब संकट गहरा गया तब विभीषण ने श्री राम को सुझाव दिया कि लंका के राजवैद्य सुषेण ही लक्ष्मण जी के प्राण बचा सकते हैं। हालांकि सुषेण शत्रु के राज्य में थे लेकिन हनुमान जी ने तनिक भी विलंब नहीं किया। वे लघु रूप धारण कर लंका में प्रविष्ट हुए और सुषेण वैद्य को उनके भवन सहित उठा लाए। सुषेण ने लक्ष्मण जी की नाड़ी जांची और अत्यंत गंभीर स्वर में कहा कि लक्ष्मण जी के प्राण केवल हिमालय में स्थित द्रोणगिरी पर्वत पर उगने वाली चार विशेष औषधियों से ही बच सकते हैं। इनमें सबसे मुख्य संजीवनी बूटी थी जो रात के अंधेरे में चमकती है। सुषेण ने चेतावनी दी कि यदि सूर्य की पहली किरण निकलने से पहले यह औषधि नहीं मिली तो अनर्थ हो जाएगा। यह सुनकर श्री राम और भी व्याकुल हो गए। तब पवनपुत्र हनुमान ने आगे बढ़कर इस कठिन कार्य का उत्तरदायित्व लिया। उन्होंने प्रभु के चरण स्पर्श किए और एक हुंकार भरकर आकाश मार्ग से हिमालय की ओर प्रस्थान कर दिया।

तीसरा अध्याय: हनुमान की यात्रा और कालनेमि का छल

हनुमान जी बिजली की गति से आकाश में उड़ रहे थे। उधर रावण को जब पता चला कि हनुमान औषधि लेने गए हैं तो उसने इसे रोकने की योजना बनाई। रावण ने कालनेमि नामक राक्षस को हनुमान जी का मार्ग रोकने के लिए भेजा। कालनेमि ने एक सुंदर आश्रम बनाया और साधु का वेश धारण कर हनुमान जी को विश्राम करने और जल पीने के लिए आमंत्रित किया। हनुमान जी ने उस पर विश्वास कर लिया लेकिन जब वे पास के सरोवर में स्नान करने गए तो एक मकरी ने उन्हें आगाह किया जो वास्तव में एक शापित अप्सरा थी। हनुमान जी ने उस मकरी का उद्धार किया और कालनेमि के वास्तविक रूप को पहचान लिया। उन्होंने उस मायावी राक्षस का वध किया और बिना समय गंवाए फिर से अपनी यात्रा शुरू की। रास्ते में उन्हें अयोध्या के ऊपर से गुजरते समय भरत जी ने देखा। भरत जी ने उन्हें कोई शत्रु समझकर बाण चलाया जिससे हनुमान जी नीचे गिर पड़े। जब हनुमान जी ने राम नाम का जाप किया और भरत जी को पूरी स्थिति बताई तो भरत जी अत्यंत दुखी हुए और उन्होंने हनुमान जी को अपने बाण पर बैठकर गंतव्य तक पहुँचाने का प्रस्ताव दिया लेकिन हनुमान जी ने विनम्रतापूर्वक मना कर दिया और पुनः उड़ चले।

चौथा अध्याय: संजीवनी पर्वत का उठाया जाना

हनुमान जी अंततः द्रोणगिरी पर्वत पर पहुँच गए। वहाँ चारों ओर दिव्य औषधियाँ चमक रही थीं जैसा सुषेण वैद्य ने बताया था। परंतु कालनेमि की बाधा और समय के अभाव के कारण हनुमान जी असमंजस में पड़ गए। वे पहचान नहीं पा रहे थे कि वास्तव में संजीवनी बूटी कौन सी है क्योंकि पर्वत पर कई तरह की वनस्पतियां एक जैसी चमक रही थीं। समय बीतता जा रहा था और उधर लंका में सूर्योदय का समय निकट आ रहा था। हनुमान जी ने सोचा कि यदि वे बूटी ढूँढने में और समय लगाएंगे तो लक्ष्मण जी के प्राण संकट में पड़ जाएंगे। ऐसे में उन्होंने अपनी बुद्धि और अपार शक्ति का परिचय दिया। उन्होंने उस पूरे द्रोणगिरी पर्वत को ही जड़ से उखाड़ लिया और उसे अपनी हथेली पर संतुलित करते हुए आकाश में उड़ चले। यह दृश्य अत्यंत अद्भुत था जिसे देखकर देवता भी चकित रह गए कि एक भक्त अपने स्वामी के भाई की रक्षा के लिए पूरा पर्वत ही उठाए जा रहा है।

पांचवां अध्याय: लक्ष्मण जी का पुनर्जीवन

जब हनुमान जी पर्वत लेकर लंका पहुँचे तो वानर सेना में खुशी का ठिकाना न रहा। सुषेण वैद्य ने तुरंत पर्वत से संजीवनी बूटी को पहचाना और उसका रस निकालकर लक्ष्मण जी को पिलाया। औषधि के प्रभाव से लक्ष्मण जी के शरीर में चेतना लौटने लगी। कुछ ही क्षणों में उन्होंने अपनी आँखें खोल दीं और उठकर बैठ गए। श्री राम ने अत्यंत भावुक होकर लक्ष्मण को गले लगा लिया और हनुमान जी के प्रति अपनी असीम कृतज्ञता व्यक्त की। श्री राम ने कहा कि हनुमान तुम मुझे भरत के समान ही प्रिय हो क्योंकि आज तुम्हारी वजह से ही मेरे भाई को जीवनदान मिला है। पूरी वानर सेना ने जय श्री राम और पवनपुत्र हनुमान के जयकारों से लंका की धरती को गुंजा दिया। इस घटना ने न केवल लक्ष्मण जी को बचाया बल्कि रावण के अहंकार को भी करारी चोट पहुँचाई क्योंकि उसे विश्वास था कि उसकी शक्ति का कोई तोड़ नहीं है।

छठा अध्याय: भक्ति और समर्पण की विजय

लक्ष्मण जी के स्वस्थ होने के बाद युद्ध फिर से शुरू हुआ लेकिन इस घटना ने राम दल में एक नया उत्साह भर दिया था। हनुमान जी द्वारा पर्वत लाना केवल शारीरिक शक्ति का प्रदर्शन नहीं था बल्कि यह उनकी बुद्धि और प्रभु के प्रति अटूट निष्ठा का प्रमाण था। उन्होंने सिद्ध कर दिया कि राम का नाम लेकर कोई भी असंभव कार्य संभव किया जा सकता है। सुषेण वैद्य ने हनुमान जी की प्रशंसा करते हुए कहा कि आज मानवता और आयुर्वेद की जीत हुई है। हनुमान जी ने अत्यंत विनम्रता के साथ उस पर्वत को वापस उसके स्थान पर पहुँचाया और लौटकर पुनः प्रभु की सेवा में लग गए। यह कथा आज भी हमें सिखाती है कि जब हम निस्वार्थ भाव से किसी की सेवा का संकल्प लेते हैं तो पूरी सृष्टि की शक्तियाँ हमारी सहायता करने लगती हैं। संजीवनी बूटी लाने की यह गाथा युगों-युगों तक हनुमान जी की महिमा और रामकथा के महत्वपूर्ण अध्याय के रूप में सुनी और सुनाई जाती रहेगी।