श्री मंदिर जी

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Shri Hanuman Mandir par aaj: Three New Stories published today;

जब भीम की असीम शक्ति एक पूंछ के सम्मुख हार गई

 

अध्याय १: वन के एकांत में उभरता वो भीषण गर्जन

पांडवों के अज्ञातवास और वनवास काल के दौरान, महाबली भीमसेन को अपनी शारीरिक शक्ति पर अत्यधिक गर्व हो चुका था। उन्हें लगता था कि इस धरा पर उनके समान बलशाली कोई अन्य जीव नहीं है। एक दोपहर, जब वे द्रौपदी के लिए दिव्य 'सौगंधिक पुष्प' की खोज में हिमालय की ओर बढ़ रहे थे, तब गंधमादन पर्वत के सघन वनों में उनका प्रवेश हुआ। वन की वायु अत्यंत शीतल थी, परंतु भीम के भीतर का अहंकार अत्यंत तीव्र। वे अपने विशाल गदा को हवा में लहराते हुए और वृक्षों को उखाड़ते हुए मार्ग बना रहे थे। अचानक, उनके मार्ग के मध्य में एक अत्यंत वृद्ध, जीर्ण-शीर्ण वानर दिखाई दिया, जो शांति से लेटा हुआ था। उस वानर का शरीर शिथिल था, परंतु उसके मुख पर एक ऐसी अलौकिक शांति थी जो साधारण जीवों में दुर्लभ होती है। भीम ने उसे देखकर एक तीव्र गर्जना की, जिससे वन के पक्षी भयभीत होकर उड़ गए।

अध्याय २: वो तुच्छ बाधा और महाबली का उपहास

भीमसेन ने उस वृद्ध वानर के समीप जाकर कड़े स्वर में कहा, "हे वनचर! तुम मार्ग के बीच में सोकर मेरे जैसे क्षत्रिय का रास्ता रोकने का दुस्साहस कैसे कर रहे हो? तुरंत उठो और अपनी इस लंबी पूंछ को मार्ग से हटाओ, अन्यथा मैं तुम्हें मृत्यु के द्वार पहुंचा दूँगा।" उस वृद्ध वानर ने, जो साक्षात् रुद्रावतार महाबली हनुमान थे, अपनी धीमी आँखें खोलीं और अत्यंत दुर्बल स्वर में कहा, "हे वीर पुरुष! मैं बहुत वृद्ध और अस्वस्थ हूँ। मुझमें उठने की सामर्थ्य नहीं है। यदि तुम्हें आगे जाना है, तो तुम स्वयं मेरी इस पूंछ को एक ओर हटाकर आगे बढ़ जाओ। मुझ असहाय पर क्रोध करने से तुम्हें क्या प्राप्त होगा?" भीम को इस साधारण वानर की बात सुनकर हंसी आ गई। उन्होंने सोचा कि एक क्षत्रिय के लिए एक वानर की पूंछ छूना अत्यंत तुच्छ कार्य है, परंतु मार्ग संकरा होने के कारण उन्होंने उसे हटाने का निश्चय किया।

अध्याय ३: एक हाथ का प्रयास और अचंभित चेतना

भीम ने अत्यंत उपेक्षा भाव से अपने बाएं हाथ से हनुमान जी की पूंछ को पकड़ा और उसे एक ओर फेंकने का प्रयास किया। परंतु, पाषाण सा सन्नाटा छा गया। वह पूंछ अपनी जगह से एक इंच भी नहीं हिली। भीम को अपनी आंखों पर विश्वास नहीं हुआ। उन्होंने सोचा कि शायद उन्होंने पर्याप्त बल नहीं लगाया। इस बार, उन्होंने अपनी गदा को भूमि पर रखा और अपने दोनों हाथों से उस पूंछ को कसकर पकड़ लिया। उन्होंने अपने पैरों को भूमि में गाड़ दिया और अपनी संपूर्ण शक्ति झोंक दी। उनकी भुजाओं की मांसपेशियां तन गईं, माथे पर पसीने की धाराएं बहने लगीं और मुख का रंग लाल हो गया, परंतु वह पूंछ किसी विशाल पर्वत की भांति भूमि से चिपकी रही।

अध्याय ४: दसों दिशाओं का बल और पराजय का बोध

वन का वातावरण अब अत्यंत गंभीर हो चुका था। भीमसेन ने अपने जीवन में हिडिम्ब, कीचक और बकासुर जैसे भयंकर राक्षसों को धूल चटाई थी, परंतु आज एक वृद्ध वानर की पूंछ उनके लिए ब्रह्मांड का सबसे भारी पदार्थ बन चुकी थी। वे अपनी पूरी शक्ति से हाहांकार कर रहे थे, धरती उनके पैरों के नीचे से धंसने लगी थी, लेकिन हनुमान जी की पूंछ में तनिक भी हलचल नहीं हुई। अंततः, भीम का पूरा शरीर शिथिल पड़ गया। उनकी सांसें उखड़ने लगीं और उनका वह गौरव, जो उन्हें पूरे संसार में सबसे बलशाली बनाता था, क्षण भर में खंड-खंड हो गया। वे समझ गए कि यह कोई साधारण वनचर नहीं, बल्कि कोई दिव्य पुरुष है।

अध्याय ५: अनसुलझे रहस्य का अनावरण और सत्य का बोध

अत्यंत थके और लज्जित होकर भीमसेन ने उस वानर के सम्मुख घुटने टेक दिए। उन्होंने हाथ जोड़कर अश्रुपूरित नेत्रों से कहा, "हे महात्मन! आप कौन हैं? कृपया अपना वास्तविक परिचय दीजिए। आपके भीतर जो बल है, वह किसी देवता का ही हो सकता है। मेरी अज्ञानता को क्षमा करें और इस अनसुलझे रहस्य से पर्दा उठाइए।" भीम के मुख से अहंकारमुक्त वाणी सुनते ही हनुमान जी मंद-मंद मुस्कुराए। उन्होंने एक लंबी सांस ली और देखते ही देखते उनका वह वृद्ध शरीर अत्यंत दीप्तिमान और दिव्य होने लगा।

अध्याय ६: मारुतिनंदन का विराट स्वरूप और आलिंगन

अचानक, उस घने वन के भीतर साक्षात् पवनपुत्र हनुमान अपने वास्तविक और अत्यंत विशाल स्वरूप में प्रकट हो गए। उनका स्वर्ण जैसा शरीर आकाश को छूने लगा और उनकी गदा सूर्य की भांति चमक रही थी। भीमसेन अपने ज्येष्ठ भ्राता हनुमान (क्योंकि दोनों ही पवनपुत्र थे) के इस अलौकिक और भयंकर रूप को देखकर भय और श्रद्धा से कांप उठे। हनुमान जी ने अत्यंत वात्सल्य के साथ अपने छोटे भाई भीम को गले से लगा लिया। जैसे ही हनुमान जी का स्पर्श भीम को मिला, उनकी सारी थकान दूर हो गई और उनके शरीर में एक नई, सात्विक ऊर्जा का संचार हुआ। हनुमान जी ने कहा, "हे भीम! शारीरिक बल पर कभी गर्व मत करना। यह बल ईश्वर की देन है और कुरुक्षेत्र के महायुद्ध में तुम्हें बल के साथ-साथ धर्म और विनम्रता की आवश्यकता होगी।"

अध्याय ७: भ्राता का आशीष और भावी विजय

हनुमान जी ने भीम को आशीष देते हुए वचन दिया, "जब तुम युद्धभूमि में अन्याय के विरुद्ध अपनी गदा उठाओगे, तो मेरी शक्ति तुम्हारे भीतर संचरित होगी। मैं अर्जुन के रथ के ध्वज पर रहकर अपनी हुंकार से शत्रुओं का मनोबल तोड़ूँगा।" श्री मंदिर जी के इस पावन आख्यान का सार यही है कि बल और बुद्धि तभी तक सार्थक हैं जब तक वे अहंकार से मुक्त हों। भीम का वह झुका हुआ मस्तक ही उन्हें महाभारत के युद्ध में अधर्म का नाश करने की वास्तविक पात्रता प्रदान कर गया। गंधमादन पर्वत का वह मौन आज भी गवाही देता है कि ईश्वर के सम्मुख समर्पण ही मनुष्य की सबसे बड़ी शक्ति है।