धनुर्धर का महा-भ्रम: रामेश्वरम के तट पर जब झुका गांडीव का गौरव
अध्याय १: वानर और महाबली का वो मौन द्वंद्व
कुरुक्षेत्र के महायुद्ध से पूर्व, जब अर्जुन अपने रथ और गांडीव धनुष के कौशल पर अत्यधिक गर्व करने लगे थे, तब नियति ने उनके लिए एक अद्भुत पथ चुना। एक सुंदर प्रभात, अर्जुन दक्षिण दिशा में भ्रमण करते हुए रामेश्वरम के उसी पावन तट पर पहुंचे, जहाँ सदियों पूर्व प्रभु श्री राम ने विशाल सेतु का निर्माण किया था। तट पर पत्थरों को देखकर अर्जुन के मुख पर एक व्यंग्यात्मक मुस्कान उभर आई। उन्होंने वहां बैठे एक अत्यंत वृद्ध और साधारण से दिखने वाले वानर को देखा, जो राम-नाम का जप कर रहा था। अर्जुन ने गर्व से कहा, "हे वानर! मर्यादा पुरुषोत्तम श्री राम इतने महान धनुर्धर थे, फिर भी उन्हें समुद्र पार करने के लिए पत्थरों के सेतु की क्या आवश्यकता थी? यदि मैं वहां होता, तो अपने बाणों से ही एक क्षण में अभेद्य सेतु का निर्माण कर देता।"
अध्याय २: वो अद्भुत चुनौती और पाषाण सा सन्नाटा
उस वृद्ध वानर ने, जो वास्तव में साक्षात् महाबली हनुमान थे, अपनी मूँदें खोलीं और मंद मुस्कान के साथ अर्जुन की ओर देखा। वानर ने अत्यंत शांत स्वर में कहा, "हे राजपुत्र! बाणों का सेतु अत्यंत दुर्बल होता है। श्री राम की सेना में मेरे जैसे विशालकाय और भारी वानर थे। तुम्हारे बाणों का सेतु हमारे एक पैर का भार भी सहन नहीं कर पाता और क्षण भर में समुद्र के गर्त में विलीन हो जाता।" यह सुनकर अर्जुन का अहंकार भड़क उठा। उन्होंने गांडीव को कसते हुए कहा, "हे वानर! तुम मेरे कौशल को नहीं जानते। मैं इस समीप बहती नदी पर अभी एक ऐसा बाण-सेतु बनाता हूँ, जिस पर तुम कितनी भी शक्ति से पैर रखना, वह नहीं टूटेगा। यदि वह टूट गया, तो मैं स्वयं को अग्नि को समर्पित कर दूँगा।" वानर ने चुनौती स्वीकार कर ली।
अध्याय ३: गांडीव से छूटा वो मायावी जाल
अर्जुन ने तुरंत अपने अक्षय तरकश से दिव्य बाण निकाले और मंत्रोच्चार के साथ नदी के एक छोर से दूसरे छोर तक बाणों की बौछार कर दी। देखते ही देखते, जल की धारा के ऊपर एक अत्यंत सुंदर, जटिल और सुदृढ़ दिखाई देने वाला बाणों का पुल तैयार हो गया। वह सेतु देखने में इतना अभेद्य लग रहा था कि अर्जुन की आँखों में जीत की चमक साफ़ दिखाई दे रही थी। उन्होंने गर्व से उस वृद्ध वानर की ओर संकेत किया और कहा, "लो वानर! जाओ और अपनी पूरी शक्ति से इस पर पैर रखो। देखें तुम्हारे भार में कितनी सामर्थ्य है।" पूरा वातावरण उस समय थम सा गया था, मानो नदी की धाराएं भी इस अद्भुत परीक्षा का परिणाम देखने के लिए रुक गई हों।
अध्याय ४: एक पग और थरथरा उठी संपूर्ण धरा
वृद्ध वानर ने जय श्री राम का उद्घोष किया और अत्यंत धीमे कदमों से उस बाण-सेतु की ओर बढ़ने लगा। जैसे ही वानर ने अपना दाहिना पैर उस सेतु पर रखा, एक भयानक कड़कड़ाहट हुई। अर्जुन का वह गर्व से निर्मित सेतु बीच से चरमराने लगा। वानर ने जैसे ही अपने पैर का थोड़ा और भार बढ़ाया, बाण एक-एक करके टूटने लगे और नदी का जल लाल होने लगा। अर्जुन यह देखकर स्तब्ध रह गए कि उस वृद्ध जीव ने अभी पूरी तरह से अपना दूसरा पैर भी नहीं रखा था और पूरा ढांचा ध्वस्त होने की कगार पर पहुँच गया था। अर्जुन के माथे पर पसीने की बूंदें चमकने लगीं, क्योंकि उनकी प्रतिज्ञा के अनुसार अब उन्हें अग्नि समाधि लेनी थी।
अध्याय ५: सुदर्शन की अदृश्य रक्षा और सत्य का उदय
जब अर्जुन अत्यंत ग्लानि से भरकर अग्नि प्रज्वलित करने लगे, तब वहां एक संन्यासी का आगमन हुआ। वह संन्यासी कोई और नहीं, बल्कि साक्षात् भगवान श्री कृष्ण थे। उन्होंने कहा कि इस परीक्षा का कोई साक्षी नहीं था, इसलिए यह मान्य नहीं है। कृष्ण की आज्ञा से अर्जुन ने पुनः एक और सुदृढ़ बाण-सेतु का निर्माण किया। इस बार जैसे ही वानर ने उस पर पैर रखा, सेतु टस से मस नहीं हुआ। वानर को आश्चर्य हुआ। उन्होंने अपनी दिव्य दृष्टि से नीचे देखा, तो पाया कि स्वयं भगवान श्री कृष्ण कछुए का रूप धारण कर उस सेतु को अपनी पीठ पर थामे हुए थे और बाणों के चुभने से उनके शरीर से रक्त बह रहा था। यह देखते ही हनुमान जी अपने वास्तविक रूप में आ गए और प्रभु के चरणों में गिर पड़े।
अध्याय ६: अंजलिपुत्र का विराट रूप और अर्जुन का समर्पण
हनुमान जी के वास्तविक स्वरूप को प्रकट होते ही चारों ओर एक अलौकिक प्रकाश फैल गया। उनका आकार इतना विशाल हो गया कि वे आकाश को छूने लगे। अर्जुन ने जब देखा कि जिसे वे एक साधारण वानर समझ रहे थे, वे साक्षात् रुद्रावतार महाबली हनुमान हैं, तो उनका पूरा अहंकार क्षण भर में चूर-चूर हो गया। गांडीव उनके हाथों से छूटकर भूमि पर गिर गया। अर्जुन अश्रुपूरित नेत्रों से हनुमान जी के चरणों में साष्टांग दंडवत हो गए। हनुमान जी ने अत्यंत वात्सल्य से अर्जुन को उठाया और कहा, "हे कुंतीपुत्र! यह गर्व तुम्हारे पतन का कारण बन सकता था। कुरुक्षेत्र के महायुद्ध में तुम्हें महाशक्तियों का सामना करना है, जहाँ विनम्रता ही तुम्हारी सबसे बड़ी शक्ति होगी।"
अध्याय ७: कपिध्वज का शाश्वत आशीष
इस अद्भुत घटना के पश्चात, हनुमान जी ने अर्जुन को एक ऐसा वरदान दिया जिसने महाभारत के युद्ध की नियति बदल दी। उन्होंने वचन दिया कि वे युद्ध के दौरान अर्जुन के रथ के ध्वज (झंडे) पर 'कपिध्वज' के रूप में विराजमान रहेंगे। जब भी अर्जुन बाण छोड़ेंगे, हनुमान जी की हुंकार से शत्रुओं का हृदय दहल उठेगा और उनका रथ सदैव सुरक्षित रहेगा। श्री मंदिर जी के इस पावन आख्यान का सार यही है कि ईश्वर के दिए हुए कौशल पर कभी अहंकार नहीं करना चाहिए। शक्ति और विद्या तभी शोभा देती हैं जब वे विनम्रता के आभूषण से सुसज्जित हों। अर्जुन का वह झुका हुआ मस्तक ही उनकी वास्तविक विजय की पहली सीढ़ी बना।