श्री मंदिर जी

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श्री कृष्ण की मृत्यु का अनसुलझा रहस्य: प्रभास वन का वो बाण जिसने ब्रह्मांड को रुला दिया

 







अध्याय १: प्रभास वन का वो कंपन

​सोमनाथ के निकट प्रभास क्षेत्र का वह प्राचीन वन आज साधारण नहीं था। सूर्यदेव अस्ताचल की ओर बढ़ रहे थे, परंतु उनकी किरणें उष्णता के बजाय एक विचित्र सी शीतलता प्रसारित कर रही थीं। हवाएं थम गई थीं, और वृक्षों के पत्ते भी मौन हो गए थे। वन के पशु-पक्षी, जो सदैव कलरव करते रहते थे, आज जैसे किसी अदृश्य भय से ग्रसित होकर दुबक गए थे। उस मौन सन्नाटे को केवल एक दिव्य उपस्थिति का सूक्ष्म कंपन ही भंग कर रहा था। भगवान श्री कृष्ण, जो द्वारकाधीश थे, जिनके मुख पर सदैव एक शांत मुस्कान रहती थी, आज वे मौन थे। वे एक विशाल वटवृक्ष की जड़ों के सहारे बैठे थे, और उनकी दृष्टि अनंत की ओर थी। वातावरण में एक ऐसी उत्कंठा व्याप्त थी, जैसे कुछ होने वाला हो, कुछ ऐसा जो समय की गति को सदा के लिए बदल देगा। वह कंपन भौतिक नहीं, बल्कि आध्यात्मिक था, जिसे केवल वे सिद्ध पुरुष ही अनुभव कर सकते थे जो इस धरा पर होने वाले ब्रह्मांडीय परिवर्तनों को समझने का सामर्थ्य रखते हों।

​अध्याय २: अनसुने पदचापों की आहट

​उसी समय, वन की गहराइयों से एक व्याध (शिकारी), जिसका नाम जरा था, आगे बढ़ रहा था। वह कोई साधारण शिकारी नहीं था; उसके भीतर भी एक ऐसी बेचैनी थी जो उसे इस दिशा में खींच लाई थी। उसे ऐसा अनुभव हो रहा था मानो कोई अदृश्य शक्ति उसे मार्ग दिखा रही हो। वह कई दिनों से एक विशेष मृग (हिरण) का पीछा कर रहा था, परंतु वह मृग बार-बार उसकी आँखों से ओझल हो जाता था। आज, उसे लगा कि उसने उस मृग को वटवृक्ष के नीचे विश्राम करते हुए देख लिया है। उसकी आँखों पर एक ऐसी मायावी परत चढ़ गई थी कि उसे भगवान श्री कृष्ण का वह दिव्य चरण, जो वटवृक्ष की जड़ों के बीच मुड़ा हुआ था और मंद गति से हिल रहा था, एक मृग का मुख प्रतीत हुआ। उसने अत्यंत सावधानी से अपने तरकश से एक बाण निकाला। यह कोई साधारण बाण नहीं था; इसके अग्रभाग पर एक विशिष्ट धातु का टुकड़ा जड़ा था।

​अध्याय ३: गांधारी का वो भीषण शाप और समय की कड़ी

​इस दिव्य अनसुलझी कथा की जड़ें कुरुक्षेत्र के महायुद्ध के पश्चात के उन रक्तरंजित क्षणों में छिपी हैं। जब युद्ध समाप्त हुआ और चारों ओर केवल लाशों का ढेर था, तब माता गांधारी, जो अपने सौ पुत्रों के संहार से अत्यंत दुखी थीं, उन्होंने भगवान श्री कृष्ण को देखा। उनके भीतर एक भयानक कोप और अपार शोक उमड़ पड़ा। उन्होंने अपनी आँखों पर बंधी पट्टी के भीतर से एक ऐसी दृष्टि डाली कि प्रकृति भी कांप उठी। गांधारी ने भगवान श्री कृष्ण को शाप दिया था कि जैसे उनके वंश का संहार हुआ है, वैसे ही एक दिन द्वारकाधीश के यदुवंश का भी सर्वनाश होगा, और स्वयं भगवान श्री कृष्ण भी एक साधारण मनुष्य की भांति, किसी अनजान व्यक्ति के हाथों अत्यंत असहज परिस्थिति में इस धरा को त्याग देंगे। यह शाप केवल एक शोक संतप्त माता की वाणी नहीं थी, बल्कि यह कालचक्र की एक अनिवार्य कड़ी थी, जिसे स्वयं भगवान को भी स्वीकार करना ही था।

​अध्याय ४: ऋषियों का शाप और मूसल का अभिशाप

​समय बीतता गया और द्वारका में यदुवंश का अहंकार बढ़ता गया। एक दिन, कुछ उच्छृंखल यदुवंशी राजकुमारों ने ऋषियों के साथ एक परिहास करने का निश्चय किया। उन्होंने कृष्ण के पुत्र सांब को एक स्त्री के वेश में सजाया और ऋषियों के सम्मुख जाकर पूछा कि इस स्त्री को क्या उत्पन्न होगा। ऋषियों ने अपनी दिव्य दृष्टि से सब जान लिया और वे अत्यंत क्रोधित हो उठे। उन्होंने शाप दिया कि सांब के उदर से एक ऐसा मूसल उत्पन्न होगा जो संपूर्ण यदुवंश के सर्वनाश का कारण बनेगा। भगवान श्री कृष्ण और बलराम ने इसे भगवान की इच्छा मानकर स्वीकार कर लिया। जब मूसल उत्पन्न हुआ, तो यदुवंशियों ने उसे पीसकर समुद्र में बहा दिया। परंतु, उस मूसल का एक छोटा सा, विशिष्ट धातु का टुकड़ा एक मछली निगल गई। वह मछली एक व्याध द्वारा पकड़ी गई, और उसी टुकड़े को उसने अपने बाण के अग्रभाग पर लगा लिया था। वही व्याध आज जरा था।

​अध्याय ५: ब्रह्मांडीय सत्य का अनावरण

​जरा ने अपनी दृष्टि स्थिर की, अपनी सांसों को नियंत्रित किया और उस मायावी मृग-मुख (भगवान के चरण) की ओर बाण छोड़ दिया। बाण वायु को चीरता हुआ आगे बढ़ा। जैसे ही वह बाण भगवान श्री कृष्ण के चरण के उस विशिष्ट अंग पर लगा, पूरा ब्रह्मांड क्षण भर के लिए स्तब्ध हो गया। वह बाण सीधे उस स्थान पर लगा जहाँ भगवान का एकमात्र मानवोचित कमजोर बिंदु माना जाता था। परंतु, वहाँ कोई रक्तपात नहीं हुआ, बल्कि एक दिव्य स्वर्ण ज्योति प्रस्फुटित हुई। उस क्षण, जरा को अपनी आँखों पर चढ़ी हुई मायावी परत हटती हुई अनुभव हुई। उसे मृग के बजाय साक्षात् द्वारकाधीश दिखाई दिए। वह अपनी भूल पर अत्यंत भयभीत होकर भागा और भगवान के चरणों में गिर पड़ा। यह एक ऐसी अनसुलझी दिव्य घटना थी जहाँ एक तुच्छ बाण ने ब्रह्मांड के आधार को स्पर्श कर लिया था।

​अध्याय ६: कालजयी का दिव्य मौन

​भगवान श्री कृष्ण ने जरा को देखा, और उनके मुख पर पुनः वही चिरंतन, शांत मुस्कान उभर आई। उन्होंने जरा को भयमुक्त किया और कहा, "वत्स, डरो मत। यह सब काल की अनिवार्य योजना का हिस्सा है। तू केवल एक माध्यम बना है। मेरे इस धरा को त्यागने का यही समय निश्चित था, और इस प्रकार की मृत्यु भी गांधारी के शाप और नियति के विधान को पूर्ण करने के लिए आवश्यक थी।" भगवान ने जरा को क्षमा किया और उसे आश्वासन दिया कि इस कर्म के पश्चात उसे भी सद्गति प्राप्त होगी। इसके पश्चात, भगवान श्री कृष्ण ने वटवृक्ष के नीचे ही अपना शरीर त्याग दिया। उनका वह दिव्य ज्योतिर्मय स्वरूप ब्रह्मांडीय शक्तियों में विलीन हो गया। उस मौन क्षण में, प्रभास वन में एक ऐसी शांति व्याप्त हो गई जो आज भी वहाँ अनुभव की जा सकती है।

​अध्याय ७: प्रभास का चिरंतन रहस्य

​भगवान श्री कृष्ण के धरा त्यागने के पश्चात, यदुवंशियों ने प्रभास तट पर एक भीषण गृहयुद्ध किया और ऋषियों के शाप के अनुसार संपूर्ण यदुवंश नष्ट हो गया। द्वारका नगरी भी समुद्र में विलीन हो गई। परंतु, वह वटवृक्ष और प्रभास क्षेत्र आज भी साक्षी है उस दिव्य, अनसुलझे रहस्य का। लोग आज भी उस स्थान पर जाते हैं, परंतु वे नहीं समझ पाते कि एक भगवान, जो सर्वशक्तिमान थे, उन्होंने इस प्रकार एक साधारण व्याध के हाथों मृत्यु को क्यों स्वीकार किया? क्या यह केवल एक शाप था या किसी उच्च ब्रह्मांडीय सत्य का हिस्सा? श्री मंदिर जी के इस पावन आख्यान का सार यही है कि ईश्वर चाहे कितने भी समर्थ क्यों न हों, जब वे मानव रूप में अवतरित होते हैं, तो वे स्वयं के बनाए हुए नियमों और शापों को भी स्वीकार करते हैं। वह मौन आज भी गूंज रहा है, एक ऐसे रहस्य के रूप में जिसे समय की गर्त ने सदा के लिए अपने भीतर समेट लिया है।