श्री मंदिर जी

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Shri Hanuman Mandir par aaj: हनुमान जी की लीला अपरंपार है

भगवान विट्ठल और भक्त पुंडलिक की पावन कथा

 

अध्याय १: पुंडलिक का प्रारंभिक जीवन और माता पिता का तिरस्कार

महाराष्ट्र की पावन धरती पर चंद्रभागा नदी के तट पर पुंडलिक नाम का एक युवक रहता था। अपने जीवन के शुरुआती दिनों में पुंडलिक एक आदर्श पुत्र नहीं था। उसका विवाह होने के बाद वह अपनी पत्नी के मोह में इतना अंधा हो गया कि उसने अपने वृद्ध माता-पिता की सेवा करना छोड़ दिया। वह अपने माता-पिता के साथ बहुत बुरा व्यवहार करता था और उन्हें घर के सारे कठिन काम करने पर मजबूर करता था। एक समय ऐसा आया जब उसके माता-पिता ने काशी की तीर्थयात्रा पर जाने का निश्चय किया। पुंडलिक और उसकी पत्नी भी उनके साथ चल दिए, लेकिन रास्ते में भी पुंडलिक ने अपने माता-पिता को आराम नहीं दिया। वह स्वयं और उसकी पत्नी घोड़े पर सवार होकर चलते थे, जबकि उसके वृद्ध माता-पिता पैदल चलकर थक जाते थे।

अध्याय २: कुक्कुट ऋषि के आश्रम में हृदय परिवर्तन

तीर्थयात्रा के दौरान पुंडलिक और उसका परिवार कुक्कुट ऋषि के आश्रम में रुके। वहां आधी रात को पुंडलिक की नींद खुली और उसने एक अद्भुत दृश्य देखा। उसने देखा कि कुछ मलिन और गंदे वस्त्र पहने हुए स्त्रियां आश्रम में प्रवेश कर रही हैं। वे आश्रम की साफ-सफाई कर रही थीं और ऋषि की सेवा कर रही थीं। सेवा करने के बाद जब वे बाहर निकलीं, तो उनके वस्त्र एकदम स्वच्छ और उज्ज्वल हो गए थे। पुंडलिक यह देखकर दंग रह गया। उसने उन स्त्रियों के पास जाकर उनका परिचय पूछा। उन स्त्रियों ने बताया कि वे गंगा, यमुना और अन्य पवित्र नदियां हैं। उन्होंने कहा कि लोग हमारे जल में स्नान करके अपने पाप धोते हैं, जिससे हम गंदी हो जाती हैं, लेकिन इस आश्रम में कुक्कुट ऋषि की सेवा और उनकी माता-पिता की भक्ति के पुण्य से हम पुनः स्वच्छ हो जाती हैं।

अध्याय ३: सेवा का महत्व और पुंडलिक का प्रायश्चित

नदियों की बात सुनकर पुंडलिक को अपनी बड़ी भूल का अहसास हुआ। उसे समझ आया कि माता-पिता की सेवा ही संसार की सबसे बड़ी पूजा है। उसके मन में अपने किए पर गहरा पश्चाताप हुआ। उसने उसी क्षण अपने माता-पिता के चरणों में गिरकर क्षमा मांगी। उस दिन के बाद पुंडलिक पूरी तरह बदल गया। वह अपने माता-पिता की सेवा में दिन-रात एक करने लगा। उसने तीर्थयात्रा का विचार त्याग दिया और वापस अपने गांव लौट आया। उसने यह जान लिया कि यदि घर में माता-पिता दुखी हैं, तो बाहर के मंदिरों में भगवान को ढूंढना व्यर्थ है। पुंडलिक की भक्ति इतनी निस्वार्थ और गहरी थी कि उसकी ख्याति चारों ओर फैलने लगी।

अध्याय ४: भगवान श्री कृष्ण का आगमन

पुंडलिक की अनन्य पितृ-भक्ति को देखकर वैकुंठ में स्वयं भगवान श्री कृष्ण (विष्णु जी) प्रसन्न हो गए। भगवान ने सोचा कि वे स्वयं जाकर अपने ऐसे महान भक्त के दर्शन करेंगे। भगवान श्री कृष्ण वैकुंठ से सीधे पुंडलिक के घर पहुंचे। उस समय पुंडलिक अपने वृद्ध पिता के पैर दबा रहा था और उनकी सेवा में लीन था। भगवान उसके दरवाजे पर खड़े हो गए। भगवान ने उसे पुकारा और कहा कि पुंडलिक, देखो मैं तुम्हारा आराध्य देव तुम्हें दर्शन देने आया हूं। पुंडलिक ने पीछे मुड़कर देखा कि साक्षात भगवान उसके द्वार पर खड़े हैं, लेकिन उसके लिए उसके पिता की सेवा सर्वोपरि थी।

अध्याय ५: ईंट का आसन और विट्ठल स्वरूप

पुंडलिक ने भगवान से कहा कि हे प्रभु, आपका स्वागत है, परंतु अभी मैं अपने पिता की सेवा कर रहा हूं। मैं अपनी सेवा अधूरी छोड़कर नहीं उठ सकता। कृपया आप थोड़ी देर प्रतीक्षा करें। पुंडलिक ने पास में ही पड़ी एक ईंट भगवान की ओर सरका दी और कहा कि आप इस ईंट पर खड़े होकर मेरी प्रतीक्षा करें। भगवान अपने भक्त की आज्ञा मानकर उस ईंट पर दोनों हाथ कमर पर रखकर खड़े हो गए। पुंडलिक अपने पिता की सेवा करता रहा और भगवान ईंट पर खड़े होकर मुस्कुराते रहे। ईंट को मराठी में वीट कहा जाता है और खड़े होने को ठल। इसी कारण भगवान का नाम विट्ठल पड़ा, जिसका अर्थ है ईंट पर खड़ा रहने वाला।

अध्याय ६: पंढरपुर धाम की स्थापना

जब पुंडलिक अपनी सेवा से निवृत्त हुआ, तब उसने भगवान के चरणों में गिरकर प्रणाम किया। भगवान ने उससे वरदान मांगने को कहा। पुंडलिक ने बहुत ही सुंदर वरदान मांगा। उसने कहा कि हे प्रभु, यदि आप मुझ पर प्रसन्न हैं, तो आप इसी रूप में इसी स्थान पर सदैव के लिए निवास करें ताकि आपके दर्शन मात्र से भक्तों का कल्याण हो सके। भगवान ने उसकी बात मान ली और वे उसी ईंट पर विग्रह के रूप में स्थापित हो गए। वही स्थान आज पंढरपुर के नाम से जाना जाता है, जो महाराष्ट्र का सबसे बड़ा तीर्थ स्थल है। यहां भगवान विट्ठल को विठोबा या पांडुरंग के नाम से भी पुकारा जाता है।

अध्याय ७: वारी परंपरा और संतों की भक्ति

भगवान विट्ठल की भक्ति ने महाराष्ट्र में एक महान संत परंपरा को जन्म दिया। संत ज्ञानेश्वर, संत तुकाराम, संत नामदेव और संत चोखामेला जैसे अनेक संतों ने विट्ठल की महिमा का गुणगान किया। हर वर्ष आषाढ़ और कार्तिक मास की एकादशी पर लाखों भक्त पैदल चलकर पंढरपुर पहुंचते हैं, जिसे वारी कहा जाता है। ये भक्त हाथों में ताल-मृदंग लेकर विट्ठल-विट्ठल का जाप करते हुए सैकड़ों किलोमीटर की यात्रा करते हैं। यह परंपरा सैकड़ों वर्षों से चली आ रही है और यह मानवता और भक्ति का सबसे बड़ा उदाहरण पेश करती है। पंढरपुर में चंद्रभागा नदी के तट पर स्नान करना अत्यंत पुण्यकारी माना जाता है।

अध्याय ८: विट्ठल भक्ति का संदेश

भगवान विट्ठल की यह कथा हमें सिखाती है कि कर्म ही पूजा है। पुंडलिक ने दिखा दिया कि माता-पिता की सेवा भगवान की भक्ति से भी बड़ी है। भगवान विट्ठल स्वयं प्रेम और करुणा के अवतार हैं। वे अपने भक्तों के लिए युगों-युगों से उसी ईंट पर खड़े हैं। उनकी मूरत हमें धैर्य और सेवा का संदेश देती है। विट्ठल भक्ति में कोई ऊंच-नीच नहीं है, वहां राजा और रंक सब एक ही कतार में खड़े होकर अपने आराध्य के दर्शन करते हैं। जो कोई भी सच्चे मन से विट्ठल का नाम लेता है, उसके जीवन के सारे दुख दूर हो जाते हैं। महाराष्ट्र की संस्कृति और लोकजीवन में विट्ठल रचे-बसे हैं और उनकी यह पावन कथा सदैव मानवता का मार्गदर्शन करती रहेगी।