भगवान जगन्नाथ का प्राकट्य और अनूठी महिमा
अध्याय १: राजा इंद्रद्युम्न की भक्ति और संकल्प
प्राचीन काल में मालवा देश में राजा इंद्रद्युम्न नाम के एक परम प्रतापी और विष्णु भक्त राजा राज करते थे। उनका मन सदैव भगवान के दर्शन के लिए व्याकुल रहता था। एक बार उनके दरबार में एक तीर्थयात्री आया, जिसने उन्हें नीलमाधव के बारे में बताया। उसने कहा कि उड़ीसा के घने जंगलों में नील पर्वत पर साक्षात भगवान विष्णु नीलमाधव के रूप में निवास करते हैं। राजा ने तुरंत अपने पुरोहित के भाई विद्यापति को उस स्थान की खोज के लिए भेजा। विद्यापति ने जंगल में जाकर देखा कि वहां के कबीलाई मुखिया विश्ववसु नीलमाधव की गुप्त रूप से पूजा करते हैं। विद्यापति ने चतुराई और भक्ति से उस स्थान का पता लगा लिया और राजा को सूचना दी। राजा इंद्रद्युम्न जब वहां पहुंचे, तो भगवान अंतर्ध्यान हो चुके थे। राजा अत्यंत दुखी हुए और अन्न जल त्याग दिया। तब आकाशवाणी हुई कि राजा निराश न हों, उन्हें समुद्र में तैरता हुआ एक विशाल नीम का लकड़ी का लट्ठा मिलेगा, जिससे वे भगवान की मूर्तियों का निर्माण करवाएं।
अध्याय २: समुद्र से दिव्य दारु की प्राप्ति
आकाशवाणी के अनुसार राजा को पुरी के तट पर समुद्र में तैरता हुआ एक दिव्य लकड़ी का लट्ठा मिला, जिस पर शंख, चक्र, गदा और पद्म के चिह्न बने थे। इसे दारु ब्रह्म कहा गया। राजा ने उस लकड़ी को बाहर निकलवाया और राज्य के सर्वश्रेष्ठ कारीगरों को बुलाया ताकि वे भगवान की मूर्तियों का निर्माण कर सकें। लेकिन एक विचित्र समस्या उत्पन्न हुई। जो भी कारीगर उस लकड़ी पर अपनी छैनी चलाता, उसकी छैनी टूट जाती या मुड़ जाती। राजा फिर से चिंता में डूब गए कि इस दिव्य लकड़ी से मूर्तियां कैसे बनेंगी। वे समझ गए कि यह कोई साधारण लकड़ी नहीं है और इसके लिए किसी दिव्य शिल्पी की आवश्यकता है। राजा ने भगवान से प्रार्थना की कि वे स्वयं मार्ग दिखाएं।
अध्याय ३: वृद्ध शिल्पी और राजा की शर्त
राजा की प्रार्थना सुनकर स्वयं देवशिल्पी विश्वकर्मा एक वृद्ध ब्राह्मण कारीगर का रूप धरकर प्रकट हुए। उन्होंने राजा से कहा कि वे इन मूर्तियों का निर्माण कर सकते हैं, लेकिन उनकी एक शर्त है। शर्त यह थी कि वे २१ दिनों तक एक बंद कमरे में मूर्तियों का निर्माण करेंगे और उस दौरान कोई भी कमरे का दरवाजा नहीं खोलेगा। यदि किसी ने भी दरवाजा खोला, तो वे काम अधूरा छोड़कर चले जाएंगे। राजा इंद्रद्युम्न ने यह शर्त स्वीकार कर ली। कमरे के अंदर से लकड़ी काटने और छैनी चलने की आवाजें आने लगीं। राजा और उनकी रानी गुंडिचा प्रतिदिन दरवाजे के बाहर खड़े होकर उन आवाजों को सुनते थे और प्रतीक्षा करते थे कि कब भगवान के दर्शन होंगे।
अध्याय ४: रानी का हठ और अधूरी मूर्तियां
जैसे-जैसे दिन बीतते गए, राजा और रानी की उत्सुकता बढ़ती गई। पंद्रह दिनों के बाद अचानक कमरे के अंदर से आने वाली आवाजें बंद हो गईं। कई दिनों तक जब कोई आवाज नहीं आई, तो रानी गुंडिचा को चिंता होने लगी। उन्हें लगा कि शायद वृद्ध कारीगर के साथ कुछ अनहोनी हो गई है या वे भूख-प्यास से व्याकुल हो गए होंगे। रानी ने राजा से दरवाजा खोलने का आग्रह किया। राजा ने अपनी प्रतिज्ञा याद दिलाई, लेकिन रानी के हठ और ममता के आगे वे विवश हो गए। जैसे ही दरवाजा खोला गया, अंदर कोई कारीगर नहीं था। वहां केवल तीन अधूरी लकड़ी की मूर्तियां थीं, जिनके हाथ और पैर पूरे नहीं बने थे। राजा को अपनी भूल का बहुत दुख हुआ और वे पश्चाताप करने लगे कि उन्होंने अपनी प्रतिज्ञा क्यों तोड़ी।
अध्याय ५: भगवान का आश्वासन और स्वरूप का रहस्य
राजा को विलाप करते देख भगवान ने उन्हें स्वप्न में दर्शन दिए और कहा कि वे दुखी न हों। भगवान ने बताया कि वे इसी अधूरे स्वरूप में इस धरती पर निवास करना चाहते हैं। उनके हाथ और पैर न होना यह दर्शाता है कि वे बिना अंगों के भी सब कुछ देख सकते हैं, सुन सकते हैं और पूरे ब्रह्मांड का संचालन कर सकते हैं। भगवान ने आदेश दिया कि उन्हें इसी रूप में स्थापित किया जाए। इसी प्रकार भगवान जगन्नाथ, उनके भाई बलभद्र और बहन सुभद्रा की मूर्तियों की स्थापना पुरी के विशाल मंदिर में की गई। जगन्नाथ का अर्थ है जगत के स्वामी। उनका यह रूप अत्यंत निराला है, जिसमें उनकी बड़ी-बड़ी आंखें संपूर्ण संसार पर करुणा की दृष्टि रखती हैं।
अध्याय ६: रथ यात्रा की परंपरा और महत्व
भगवान जगन्नाथ के मंदिर से जुड़ी सबसे महत्वपूर्ण परंपरा विश्व प्रसिद्ध रथ यात्रा है। हर वर्ष आषाढ़ मास के शुक्ल पक्ष की द्वितीया तिथि को भगवान जगन्नाथ अपने भाई और बहन के साथ अपनी मौसी के घर गुंडिचा मंदिर जाते हैं। इस यात्रा के लिए तीन विशाल रथों का निर्माण किया जाता है। माना जाता है कि जो व्यक्ति श्रद्धा भाव से भगवान के रथ को खींचता है, उसे पुनर्जन्म के चक्र से मुक्ति मिल जाती है। रथ यात्रा के दौरान राजा स्वयं झाड़ू लगाकर भगवान के मार्ग को साफ करते हैं, जो यह संदेश देता है कि भगवान के सामने राजा और रंक सब समान हैं। यह उत्सव जाति, धर्म और ऊंच-नीच के भेदभाव को मिटाकर भाईचारे का संदेश देता है।
अध्याय ७: महाप्रसाद और दिव्य रसोई
जगन्नाथ पुरी मंदिर की एक और बड़ी विशेषता वहां का महाप्रसाद है। कहा जाता है कि पुरी में कोई भी व्यक्ति भूखा नहीं सोता। मंदिर की रसोई दुनिया की सबसे बड़ी रसोई मानी जाती है, जहां मिट्टी के सात बर्तनों को एक के ऊपर एक रखकर खाना पकाया जाता है। आश्चर्य की बात यह है कि सबसे ऊपर रखे बर्तन का खाना सबसे पहले पकता है। इस प्रसाद को ग्रहण करने के लिए किसी नियम या शुद्धता के कठोर बंधन नहीं होते, क्योंकि भगवान के दरबार में सब बराबर हैं। इस महाप्रसाद को पाकर भक्त धन्य हो जाते हैं और माना जाता है कि इसमें स्वयं लक्ष्मी जी का वास होता है।
अध्याय ८: कलयुग के प्रत्यक्ष देवता
भगवान जगन्नाथ को कलयुग का प्रत्यक्ष देवता माना जाता है। पुरी का मंदिर कई रहस्यों से भरा है, जैसे मंदिर के शिखर पर लगा झंडा सदैव हवा की विपरीत दिशा में लहराता है और मंदिर की कोई परछाई जमीन पर नहीं पड़ती। ये चमत्कार श्रद्धालुओं की आस्था को और भी गहरा करते हैं। भगवान जगन्नाथ की कथा हमें यह सिखाती है कि भक्ति में पूर्ण समर्पण आवश्यक है। वे अपने भक्तों के प्रेम के भूखे हैं और जो भी उन्हें सच्चे मन से पुकारता है, वे उसकी सहायता के लिए दौड़े चले आते हैं। जगन्नाथ पुरी का धाम मुक्ति का द्वार माना जाता है और वहां की गई पूजा कभी निष्फल नहीं होती। आज भी लाखों भक्त जय जगन्नाथ के उद्घोष के साथ अपनी मनोकामनाएं लेकर वहां पहुंचते हैं और शांति प्राप्त करते हैं।
