भीष्म पितामह की भीषण प्रतिज्ञा और उनके महान त्याग की संपूर्ण गाथा
अध्याय १: राजकुमार देवव्रत का जन्म और शिक्षा हस्तिनापुर के प्रतापी राजा शांतनु और देवनदी गंगा के पुत्र देवव्रत का जन्म एक दिव्य घटना थी। माता गंगा उन्हें अपने साथ ले गई थीं और उन्हें वशिष्ठ, परशुराम और बृहस्पति जैसे महान ऋषियों से अस्त्र-शस्त्र और शास्त्रों की शिक्षा दिलाई। जब देवव्रत जवान हुए, तो गंगा ने उन्हें राजा शांतनु को सौंप दिया। देवव्रत न केवल एक कुशल योद्धा थे, बल्कि उनके चेहरे पर एक अद्भुत तेज और स्वभाव में अपार विनम्रता थी। पूरी हस्तिनापुर की प्रजा उन्हें अपने भविष्य के राजा के रूप में देख रही थी और राजा शांतनु भी अपने योग्य पुत्र को पाकर अत्यंत हर्षित थे। उन्हें लग रहा था कि कुरु वंश का भविष्य अब सुरक्षित हाथों में है।
अध्याय २: राजा शांतनु की व्याकुलता और सत्यवती का मिलन एक दिन राजा शांतनु यमुना तट पर टहल रहे थे, तभी उन्हें एक दिव्य सुगंध महसूस हुई। उस सुगंध का पीछा करते हुए वे निषादराज की पुत्री सत्यवती (मत्स्यगंधा) के पास पहुँचे। सत्यवती की सुंदरता और उनके शांत स्वभाव को देखकर राजा उन पर मोहित हो गए। उन्होंने तत्काल सत्यवती के पिता के समक्ष विवाह का प्रस्ताव रखा। किंतु, सत्यवती के पिता केवटराज एक चतुर व्यक्ति थे। उन्होंने राजा से कहा, "महाराज, मैं अपनी पुत्री का हाथ आपके हाथ में दे सकता हूँ, परंतु मेरी एक शर्त है। मेरी पुत्री की कोख से उत्पन्न पुत्र ही हस्तिनापुर का उत्तराधिकारी बनेगा, आपके ज्येष्ठ पुत्र देवव्रत नहीं।" राजा शांतनु धर्मसंकट में पड़ गए। वे देवव्रत से बहुत प्रेम करते थे और उनके साथ यह अन्याय नहीं करना चाहते थे। वे दुखी मन से चुपचाप महल लौट आए, लेकिन उनका मन सत्यवती में ही अटका रहा।
अध्याय ३: देवव्रत का पता लगाना और पिता का दुःख दूर करना राजकुमार देवव्रत ने देखा कि उनके पिता दिन-ब-दिन कमजोर और उदास होते जा रहे हैं। उन्होंने मंत्रियों और सारथी से पूछताछ की और सत्यवती के प्रसंग के बारे में जाना। पिता का दुःख दूर करने के लिए देवव्रत स्वयं केवटराज के पास पहुँचे। उन्होंने केवटराज को आश्वासन दिया, "हे आर्य! मैं स्वयं राज्य के अधिकार का त्याग करता हूँ। मेरी माता सत्यवती का पुत्र ही राजा बनेगा।" केवटराज ने फिर एक शंका जताई, "राजकुमार, आप तो धर्मात्मा हैं, आप अपनी बात पर टिके रहेंगे। परंतु आपकी संतान? यदि कल आपकी संतान ने मेरे नाती-पोतों से राज छीन लिया, तो क्या होगा?" यह प्रश्न अत्यंत कठिन था, पर देवव्रत का पिता-प्रेम अडिग था।
अध्याय ४: वह भीषण प्रतिज्ञा जिसने इतिहास बदल दिया केवटराज की शंका को जड़ से मिटाने के लिए देवव्रत ने गंगा के तट पर खड़े होकर, आकाश और पाताल को साक्षी मानकर एक ऐसी भीषण प्रतिज्ञा ली, जिसकी कल्पना भी असंभव थी। उन्होंने कहा, "मैं आज से आजीवन ब्रह्मचर्य का पालन करूँगा। मैं कभी विवाह नहीं करूँगा और कभी पिता नहीं बनूँगा, ताकि भविष्य में मेरी कोई संतान ही न हो जो सिंहासन पर दावा कर सके।" इस भयंकर प्रतिज्ञा को सुनते ही चारों ओर हाहाकार मच गया। देवताओं ने आकाश से पुष्प वर्षा की और उन्हें 'भीष्म' (अर्थात वह जिसने कठिन प्रतिज्ञा ली हो) नाम से संबोधित किया।
अध्याय ५: इच्छा मृत्यु का वरदान और भीष्म का त्याग जब राजा शांतनु को इस त्याग का पता चला, तो वे फूट-फूट कर रोने लगे। उन्होंने भीष्म को हृदय से लगा लिया और उन्हें 'इच्छा मृत्यु' का वरदान दिया। उन्होंने कहा कि जब तक तुम स्वयं मृत्यु का आह्वान नहीं करोगे, काल भी तुम्हें छू नहीं पाएगा। भीष्म ने अपना पूरा जीवन सत्यवती के पुत्रों और फिर उनके पौत्रों (धृतराष्ट्र और पांडु) की सेवा में बिता दिया। उन्होंने अपनी प्रतिज्ञा की रक्षा के लिए स्वयं के सुखों का बलिदान दे दिया। वे हस्तिनापुर के सिंहासन के रक्षक बनकर रहे, पर कभी उस पर बैठे नहीं।
अध्याय ६: शरशय्या और जीवन का अंतिम उपदेश महाभारत के युद्ध में भीष्म पितामह कौरवों की ओर से लड़े, क्योंकि वे सिंहासन के प्रति वचनबद्ध थे। अंत में, जब अर्जुन ने उन्हें बाणों से छलनी कर दिया, तब भी वे मृत्यु को प्राप्त नहीं हुए क्योंकि वे सूर्य के उत्तरायण होने की प्रतीक्षा कर रहे थे। बाणों की शय्या पर लेटे हुए भी उन्होंने युधिष्ठिर को धर्म, राजनीति और मोक्ष का वह ज्ञान दिया, जिसे आज 'भीष्म पर्व' के रूप में जाना जाता है। भीष्म पितामह का चरित्र हमें सिखाता है कि कर्तव्य और वचन के लिए इंसान को कितना बड़ा त्याग करना पड़ सकता है।