श्री मंदिर जी

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Shri Hanuman Mandir par aaj: Three New Stories published today;

भक्त प्रह्लाद की भक्ति और भगवान नृसिंह अवतार की संपूर्ण कथा

 

अध्याय १: हिरण्यकश्यप का अहंकार और वरदान प्राचीन काल में हिरण्यकश्यप नाम का एक अत्यंत शक्तिशाली असुर राजा था। उसने ब्रह्मा जी की कठिन तपस्या करके एक अद्भुत वरदान प्राप्त किया था। वरदान यह था कि उसे न कोई मनुष्य मार सके न पशु, न दिन में मृत्यु हो न रात में, न अस्त्र से न शस्त्र से, न घर के भीतर न बाहर। इस वरदान के अहंकार में वह स्वयं को भगवान मानने लगा और अपनी प्रजा को विष्णु पूजा छोड़कर उसकी पूजा करने का आदेश दिया।

अध्याय २: प्रह्लाद का जन्म और अटूट विष्णु भक्ति हिरण्यकश्यप के घर में बालक प्रह्लाद का जन्म हुआ। जब प्रह्लाद की माता कयाधु गर्भवती थीं, तब वे नारद मुनि के आश्रम में रहती थीं। वहां उन्होंने नारद जी से भगवान विष्णु की महिमा सुनी, जिसका प्रभाव गर्भ में पल रहे प्रह्लाद पर पड़ा। जन्म से ही प्रह्लाद के हृदय में भगवान नारायण का वास था। वह असुरों के कुल में होने के बावजूद दिन-रात "ॐ नमो भगवते वासुदेवाय" का जाप करता था।

अध्याय ३: पिता के अत्याचार और प्रह्लाद की परीक्षा जब हिरण्यकश्यप को पता चला कि उसका पुत्र विष्णु भक्त है, तो वह क्रोध से पागल हो गया। उसने प्रह्लाद को समझाने की बहुत कोशिश की, लेकिन प्रह्लाद नहीं माना। तब हिरण्यकश्यप ने उसे मारने के कई प्रयास किए। उसने प्रह्लाद को हाथियों के पैरों तले कुचलवाया, पहाड़ों से नीचे गिरवाया और विषैले सांपों के बीच छोड़ दिया। परंतु भगवान की कृपा से प्रह्लाद का बाल भी बांका नहीं हुआ।

अध्याय ४: होलिका दहन और दिव्य चमत्कार अंत में हिरण्यकश्यप ने अपनी बहन होलिका को बुलाया। होलिका को वरदान था कि वह आग में नहीं जल सकती। होलिका प्रह्लाद को गोद में लेकर धधकती चिता पर बैठ गई। लेकिन चमत्कार हुआ—प्रह्लाद अपनी भक्ति के कारण सुरक्षित रहे और होलिका जलकर राख हो गई। यह देखकर हिरण्यकश्यप का क्रोध अपनी चरम सीमा पर पहुँच गया।

अध्याय ५: खंभे से भगवान नृसिंह का प्राकट्य क्रोधित होकर हिरण्यकश्यप ने प्रह्लाद को एक लोहे के खंभे के पास ले जाकर पूछा, "बता तेरा विष्णु कहाँ है? क्या वह इस खंभे में भी है?" प्रह्लाद ने शांत भाव से कहा, "हाँ पिताजी, वे कण-कण में हैं।" हिरण्यकश्यप ने जैसे ही खंभे पर प्रहार किया, वह खंभा फट गया और उसमें से भगवान का आधा सिंह और आधा मनुष्य वाला 'नृसिंह' अवतार प्रकट हुआ।

अध्याय ६: असुर का वध और धर्म की जीत भगवान नृसिंह ने हिरण्यकश्यप को उठाकर दहलीज (घर के बीच) पर रखा, जो न अंदर था न बाहर। समय गोधूलि बेला का था (न दिन न रात)। भगवान ने अपने नाखूनों से (जो न अस्त्र थे न शस्त्र) हिरण्यकश्यप का पेट चीर दिया। इस प्रकार ब्रह्मा जी के वरदान का सम्मान भी रहा और पापी असुर का अंत भी हुआ। प्रह्लाद की भक्ति ने सिद्ध कर दिया कि ईश्वर हमेशा अपने भक्तों के साथ रहते हैं।