अहंकारी राजा बलि और भगवान विष्णु के वामन अवतार की संपूर्ण कथा
अध्याय १: राजा बलि का उत्थान और स्वर्ग पर विजय प्राचीन काल में विरोचन के पुत्र और प्रह्लाद के पौत्र राजा बलि एक अत्यंत शक्तिशाली और न्यायप्रिय असुर राजा थे। बलि ने अपनी शक्ति और तपस्या के बल पर तीनों लोकों पर विजय प्राप्त कर ली थी। उनके राज्य में प्रजा सुखी थी, लेकिन देवताओं में इस बात का भय था कि यदि बलि का अधिकार स्वर्ग पर बना रहा, तो देवताओं का अस्तित्व समाप्त हो जाएगा। बलि ने अपने गुरु शुक्राचार्य के मार्गदर्शन में सौ 'अश्वमेध यज्ञ' करने का संकल्प लिया था। माना जाता था कि जो भी राजा १०० अश्वमेध यज्ञ पूर्ण कर लेता है, वह इंद्र के सिंहासन का स्थायी अधिकारी बन जाता है। इंद्र और अन्य देवता भयभीत होकर भगवान विष्णु की शरण में पहुँचे और उनसे रक्षा की प्रार्थना की।
अध्याय २: भगवान विष्णु का वामन रूप में अवतार देवताओं की पुकार सुनकर भगवान विष्णु ने देवमाता अदिति के गर्भ से 'वामन' (एक बौने ब्राह्मण) के रूप में अवतार लिया। जब राजा बलि अपना १००वां अश्वमेध यज्ञ नर्मदा नदी के तट पर कर रहे थे, तब भगवान वामन वहां पहुँचे। उनके तेज से यज्ञशाला प्रकाशित हो उठी। राजा बलि ने अपनी परंपरा के अनुसार ब्राह्मण का भव्य स्वागत किया और उनसे अपनी इच्छा अनुसार दान मांगने को कहा। बलि ने कहा, "हे ब्राह्मण देव! आप जो भी मांगेंगे, मैं वह आपको देने के लिए वचनबद्ध हूँ।"
अध्याय ३: तीन पग भूमि की मांग और शुक्राचार्य की चेतावनी भगवान वामन ने मुस्कुराते हुए कहा, "हे राजन! मुझे न सोना चाहिए, न चांदी और न ही बड़ा राज्य। मुझे केवल अपने पैरों के नाप के बराबर 'तीन पग भूमि' चाहिए।" राजा बलि यह सुनकर हंसने लगे। उन्हें लगा कि एक बौना ब्राह्मण तीन पग में कितनी ही जमीन ले लेगा। लेकिन बलि के गुरु शुक्राचार्य अपनी दिव्य दृष्टि से समझ गए कि यह साक्षात् भगवान विष्णु हैं। उन्होंने बलि को चेतावनी दी, "राजन! रुक जाओ, यह कोई साधारण ब्राह्मण नहीं है। यह तुम्हारा सर्वस्व छीनने आए हैं, इन्हें दान देने का वचन मत दो।"
अध्याय ४: बलि का धर्म और वचन पालन राजा बलि एक महान दानी थे। उन्होंने गुरु की आज्ञा को ठुकराते हुए कहा, "गुरुदेव! यदि स्वयं भगवान मेरे द्वार पर याचक बनकर आए हैं, तो यह मेरा सौभाग्य है। मैं अपने दिए हुए वचन से पीछे नहीं हट सकता। चाहे मेरा सर्वस्व चला जाए, पर मैं दान अवश्य दूँगा।" बलि ने जैसे ही संकल्प लेने के लिए हाथ में जल लिया, शुक्राचार्य सूक्ष्म रूप धारण करके कमंडल की नली में बैठ गए ताकि जल बाहर न गिरे। भगवान वामन ने कुशा (घास) की एक तीली से नली को साफ किया, जिससे शुक्राचार्य की एक आंख फूट गई और संकल्प पूर्ण हुआ।
अध्याय ५: विराट स्वरूप और दो पग में ब्रह्मांड का मापन संकल्प पूर्ण होते ही भगवान वामन ने अपना विराट स्वरूप धारण किया। उनका शरीर इतना विशाल हो गया कि उन्होंने अपने पहले पग में पूरी पृथ्वी नाप ली। दूसरे पग में उन्होंने स्वर्ग लोक और अंतरिक्ष को नाप लिया। अब तीसरे पग के लिए पूरे ब्रह्मांड में कोई स्थान शेष नहीं बचा था। भगवान ने बलि से पूछा, "राजन! दो पग में सब कुछ खत्म हो गया, अब बताओ तीसरा पग कहाँ रखूँ? यदि तुम अपना वचन पूरा नहीं कर पाए, तो तुम्हें अधर्म का भागी बनना होगा।"
अध्याय ६: बलि का आत्मसमर्पण और पाताल का राज्य राजा बलि विचलित नहीं हुए। उन्होंने हाथ जोड़कर अपना सिर झुका दिया और कहा, "प्रभु! संपत्ति से बड़ा संपत्ति का स्वामी होता है। कृपया अपना तीसरा पग मेरे मस्तक पर रखें।" भगवान बलि की इस निष्काम भक्ति और वचन पालन से अत्यंत प्रसन्न हुए। उन्होंने तीसरा पग बलि के सिर पर रखा और उन्हें पाताल लोक का राजा बना दिया। भगवान ने बलि को आशीर्वाद दिया कि वे अगले मन्वंतर में इंद्र बनेंगे और स्वयं उनके द्वारपाल (रक्षक) बनकर पाताल में उनके साथ रहने लगे। यह कथा सिखाती है कि अहंकार के त्याग और ईश्वर के प्रति पूर्ण समर्पण से ही मोक्ष की प्राप्ति होती है।