श्री मंदिर जी

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Shri Hanuman Mandir par aaj: Three New Stories published today;

जंगल का साया और दिव्य मौन: उंगलीमाल के अहंकार का अंतिम प्रहार

 

अध्याय १: आधी रात की डरावनी गूंज

कोसल देश का वह बीहड़ जंगल साधारण मनुष्यों के लिए साक्षात् यमलोक के समान था। उस वन की सीमा में प्रवेश करने का साहस राजा की सेना भी नहीं करती थी। हवाओं में एक ऐसी विचित्र गंध थी जो सूखे पत्तों और सूखे हुए रक्त के मिश्रण जैसी थी। उस घने अंधकार के बीच, वृक्षों की ओट से एक भयानक आकृति उभरी। उसकी आँखें जलते हुए अंगारों की भांति लाल थीं, और उसके गले में एक ऐसी माला झूल रही थी जिसे देखकर किसी भी बलशाली पुरुष का हृदय रुक जाए—वह इंसानी उंगलियों की माला थी। उंगलीमाल डाकू, जिसका नाम सुनते ही गांवों के झोपड़े थर-थर कांपने लगते थे, आज अपनी ९९९ उंगलियों की संख्या को पूरा कर चुका था। उसे केवल एक और शिकार की प्रतीक्षा थी। अचानक, वन के सन्नाटे को चीरती हुई किसी के शांत कदमों की आहट सुनाई दी। इस बीहड़ में इतनी रात गए कौन आ सकता था?

अध्याय २: वो निडर पदचाप और थरथराता खंजर

उंगलीमाल ने अपने भारी खंजर को कसकर पकड़ा। उसकी सांसें तीव्र हो गईं। उसने वृक्ष की ओट से देखा कि एक परम शांत, काषाय वस्त्र पहने हुए सन्यासी अत्यंत सहज भाव से उस मार्ग पर बढ़े चले आ रहे थे। उनके चेहरे पर न तो कोई भय था और न ही कोई चिंता, बल्कि एक ऐसी अलौकिक मुस्कान थी जो उस भयानक जंगल के वातावरण से बिल्कुल विपरीत थी। उंगलीमाल का क्रोध भड़क उठा। उसने अपनी पूरी शक्ति से चिल्लाकर कहा, "रुक जा सन्यासी! आगे बढ़ना तेरी मृत्यु को आमंत्रण देना है।" परंतु, वह सन्यासी रुके नहीं, वे उसी मंद गति से आगे बढ़ते रहे। उंगलीमाल ने उनके पीछे दौड़ना प्रारंभ किया। वह अपनी पूरी सामर्थ्य से भाग रहा था, लेकिन उसे ऐसा अनुभव हुआ मानो वह अपनी जगह पर ही खड़ा हो और वह सन्यासी हज़ारों योजन दूर जा चुके हों। यह कैसा मायावी गुरुत्वाकर्षण था? उसके माथे पर पसीने की बूंदें उभर आईं।

अध्याय ३: कोसल की विस्मृत संहिता का सत्य

प्राचीन ग्रंथों में इस वन को एक अभिशप्त क्षेत्र माना गया था, जहाँ केवल वही प्रवेश करता था जिसका अंत निकट हो। उंगलीमाल, जो कभी एक मेधावी शिष्य 'अहिंसक' था, एक झूठे लांछन और प्रतिशोध की अग्नि में जलकर इस भयानक रूप में परिवर्तित हो चुका था। उसने संकल्प लिया था कि वह एक हज़ार मनुष्यों की उंगलियां काटकर अपने गुरु की उस मांग को पूरा करेगा जो वास्तव में एक षड्यंत्र था। परंतु, इस अनसुलझी कथा का एक और दिव्य पक्ष भी था। शास्त्रों में वर्णित था कि जब क्रूरता अपने चरम पर होगी, तब एक ऐसी परम चेतना का अवतरण होगा जो शस्त्र से नहीं, बल्कि केवल अपने मौन से उस क्रूरता को जड़ से समाप्त कर देगी। आज वही क्षण उपस्थित था।

अध्याय ४: वन के रक्षकों का मौन और संवाद

उंगलीमाल भागते-भागते थक चुका था। उसने हांफते हुए पुनः चिल्लाकर कहा, "मैं कहता हूँ, रुक जा! तू मेरी शक्ति को नहीं जानता।" इस बार, उन सन्यासी ने अपने कदम रोके। उन्होंने धीरे से पीछे मुड़कर देखा। उनकी आँखों में करुणा का ऐसा अगाध सागर था जिसने उंगलीमाल के भीतर की आसुरी ऊर्जा को क्षण भर में सोख लिया। सन्यासी ने अत्यंत मधुर और गंभीर स्वर में कहा, "हे उंगलीमाल! मैं तो कब का रुक गया, परंतु तू कब रुकेगा? तू अपनी इस वासना, इस क्रोध और इस प्रतिशोध की अंतहीन दौड़ से कब विश्राम लेगा?" उन शब्दों का कंपन इतना तीव्र था कि पूरे जंगल के वृक्ष स्वतः ही झुकने लगे, मानो वे भी उस दिव्य वाणी को नमन कर रहे हों।

अध्याय ५: अनसुलझी करुणा का महा-प्रभाव

उंगलीमाल स्तब्ध रह गया। आज तक उससे किसी ने इस प्रकार बात नहीं की थी। लोग उसके सामने प्राणों की भीक्षा मांगते थे, रोते थे, चिल्लाते थे, परंतु यह सन्यासी उसकी आत्मा को झकझोर रहा था। उसने अपने खंजर को दिखाते हुए कहा, "क्या तुम्हें मुझसे भय नहीं लगता? मैं इस देश का सबसे भयंकर डाकू हूँ।" सन्यासी ने मुस्कुराते हुए कहा, "यदि तू वास्तव में बलशाली है, तो जा और उस वृक्ष से चार पत्तियां तोड़कर ला।" उंगलीमाल ने तुरंत पत्तियां तोड़ दीं। सन्यासी ने पुनः कहा, "अब इन पत्तियों को वापस उस डाल से जड़ दे।" उंगलीमाल ने झुंझलाकर कहा, "यह असंभव है! जो टूट गया, उसे जोड़ा नहीं जा सकता।" सन्यासी ने उसकी आँखों में देखते हुए कहा, "तो फिर जो तू जीवन दे नहीं सकता, उसे छीनने का ढोंग क्यों करता है?"

अध्याय ६: शस्त्र का त्याग और आंतरिक रूपांतरण

वह अंतिम प्रहार था उंगलीमाल के अहंकार पर। उसकी चेतना पर जमी सदियों पुरानी धूल क्षण भर में साफ हो गई। उसे बोध हुआ कि वह जिस सन्यासी के सम्मुख खड़ा है, वे कोई साधारण पुरुष नहीं, बल्कि साक्षात् तथागत बुद्ध हैं। उसका वह भारी खंजर, जिससे उसने न जाने कितने निर्दोषों का रक्त बहाया था, उसके हाथों से छूटकर भूमि पर गिर गया। उसके गले में लटक रही उंगलियों की माला टूटकर बिखर गई। वह महाबली डाकू, जिससे पूरी सेना कांपती थी, नवजात शिशु की भांति रोते हुए भगवान बुद्ध के चरणों में गिर पड़ा। उसने अपने समस्त पापों की क्षमा मांगी और उनके चरणों की धूल को अपने माथे पर लगा लिया।

अध्याय ७: अहिंसा का चिरंतन साम्राज्य

भगवान बुद्ध ने अपने करुणा भरे हाथों से उंगलीमाल को उठाया और उसे 'अहिंसक' के रूप में पुनः दीक्षित किया। वह वन, जो कभी चीत्कारों से गूंजता था, अब बुद्धम शरणम गच्छामि के पावन मंत्रों से पवित्र हो गया। श्री मंदिर जी के इस पावन आख्यान का अंतिम सत्य यह है कि संसार का सबसे बड़ा डाकू भी यदि सच्चे हृदय से आत्मज्ञान के सम्मुख झुक जाए, तो वह संत बन सकता है। उंगलीमाल का वह रूपांतरण आज भी इतिहास का एक ऐसा दिव्य अनसुलझा रहस्य है, जो हमें सिखाता है कि घृणा को केवल प्रेम से और हिंसा को केवल परम शांति से ही जीता जा सकता है।